गीता के अनुसार आत्मा का स्वरूप

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने आत्मा के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा है कि आत्मा अमर और अविनाशी है। यह न तो किसी शस्त्र से काटी जा सकती है, न पानी में डूब सकती है, न अग्नि में जल सकती है और न ही वायु इसे सुखा सकती है। आत्मा न तो उत्पन्न होती है और न ही नष्ट होती है — यह शाश्वत और अनंत है।

शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर है। जिस तरह एक व्यक्ति पुराने वस्त्रों को छोड़कर नए पहन लेता है, उसी तरह आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे में प्रवेश कर लेती है। यह चक्र तब तक चलता रहता है जब तक आत्मा मोक्ष की ओर नहीं पहुँच जाती।

आत्मा की यह यात्रा व्यक्ति के कर्मों पर निर्भर करती है। अच्छे कर्म उसे ऊँचे जन्म दिलाते हैं, जबकि बुरे कर्म नीचे ले जाते हैं। गीता कहती है कि जो मनुष्य आत्मा के इस सच्चे स्वरूप को जान लेता है, वह शोक और मोह से परे हो जाता है।

इसलिए गीता के अनुसार, आत्मा न केवल अमर है, बल्कि शरीर से

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