बच्चे और बड़ों में मुस्कान का अंतर
मुस्कुराहट इंसान की भावनाओं का सबसे सच्चा आईना होती है। लेकिन बच्चों और बड़ों में यह आईना काफी अलग तरह से चमकता है। बच्चे किसी मौके के बिना भी बेफिक्र होकर मुस्कुराते हैं। उनकी हँसी में खुशी की निश्छलता होती है। एक छोटा बच्चा खिलखिलाकर हँस सकता है सिर्फ एक पतंग देखकर या माँ की गोदी में झूलने पर। उनकी मुस्कान संक्रामक होती है — एक बच्चे की हँसी पूरे कमरे को रोशन कर देती है।
लेकिन बड़े होने के साथ-साथ यह मुस्कान धीरे-धीरे शर्तों में बंद हो जाती है। अब मुस्कुराने के लिए किसी खास मौके, किसी विशेष कारण या सामाजिक ज़रूरत की आवश्यकता होती है। कई बार तो मुस्कान कृत्रिम भी लग सकती है — मजबूरी या तुष्टीकरण के लिए। लोग बस इतना देखते हैं कि क्या कोई वजह थी, न कि यह कि मुस्कान सच्ची थी या नहीं।
बच्चों की हँसी बेमुखताब होती है, बड़ों की मुस्कान अक्सर मुखौटा। शायद इसीलिए जीवन के भारीपन में फंसे बड़े लोग अक्स
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