झांसी की रानी की अंतिम घड़ी

रानी लक्ष्मीबाई की वीर गाथा भारत के इतिहास में एक अमर अध्याय है। 1858 के जून महीने में, ग्वालियर के काफ़लाहा के युद्ध में, जब अंग्रेज़ सेना से लोहा लेते हुए रानी को गोली लगी, तो वे क्षण भर के लिए मूर्छित-सी हो गईं। लेकिन उनकी जुझारू आत्मा ने हार नहीं मानी।

इसी बीच, एक अंग्रेज़ सैनिक ने तलवार से उनके सिर को एक आँख समेत धड़ से अलग कर दिया। इस तरह भारत की गौरवगाथा की एक महान वीरांगना शहीद हो गईं। यह घटना भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष में एक काला दिन था।

रानी की मृत्यु के बाद, उनके शरीर को बचाने के लिए एक गुप्त योजना बनी। बाबा गंगादास की शाला के साधुओं ने, झांसी की पठान सेना की मदद से, रात के अंधेरे में उनके शरीर को छिपाकर ले जाकर शाला में लाया गया। वहीं, सादगी से उनका अंतिम संस्कार किया गया, ताकि अंग्रेज़ों की नज़र न पड़े।

आज भी झांसी की रानी की शहादत देश के लाखों दिलों में जीवित है। उनक

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