अतिथि पर लेखक की ऊब

लेखक का मन अतिथि से ऊब गया था। शुरू में तो उसके आगमन को लेकर घर में उत्साह था। मेहमान के आने की खबर सुनकर घरवालों ने तैयारियाँ शुरू कर दीं — साफ-सफाई हुई, खाने के नए-नए विकल्प सोचे गए। लेकिन धीरे-धीरे यह उत्साह झुंझलाहट में बदलने लगा।

अतिथि ने अपना समय बहुत लंबा बना लिया। वह घर की छोटी-छोटी बातों में दखल देने लगा। खाने की आदतें, घर के नियम, बच्चों की पढ़ाई — हर चीज पर उसकी राय होती। लेखक महसूस करने लगा कि अब घर में उसकी अपनी जगह भी संकुचित हो रही है।

“जब मेहमान ठहर जाए तो स्वागत भी कठिन हो जाता है,” लेखक ने मन ही मन महसूस किया। उसका धैर्य टूटने लगा। मेहमान की बातें अब बोझ लगने लगीं, उसकी आदतें चिढ़ाने लगीं। एक तरह की थकान सी छा गई।

इस स्थिति में लेखक बस इतना चाहता था कि मेहमान जल्दी जाए। लेकिन साथ ही उसे अपने दिल का द्वंद्व भी झेलना पड़ा — अतिथि का सत्कार करना एक संस्कार है, लेकिन कब तक? क्या घर की श

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