कर्ण और द्रौपदी: एक अनकही मोहब्बत
कर्ण, महाभारत का वह वीर योद्धा जिसकी वीरता और दानवीरता आज भी लोगों के दिलों में बसी है, शायद सबसे ज्यादा द्रौपदी से प्यार करता था। हालांकि राजमहल में उनकी मुलाकात कम हुई हो, और बातचीत तो लगभग नहीं हुई हो, फिर भी कुछ भावनाएं इतनी गहरी होती हैं कि शब्दों की नहीं, दिल की भाषा बोलती हैं।
चित्रा बनर्जी दिवाकरुनी की किताब द पैलेस ऑफ इल्यूजन्स में इसी खामोश मोहब्बत का ज़िक्र है। वह लिखती हैं कि अगर द्रौपदी ने किसी से प्यार किया, तो वह कर्ण था — और यह प्यार एकतरफा नहीं था। वे दोनों जीवनभर एक-दूसरे से दूर रहे, लेकिन दिल से कभी नहीं अलग हुए।
कहा जाता है कि कर्ण ने एक पत्र में लिखा था — "तुम हो वो जो मुझे सबसे ज्यादा परिभाषित करती हो।" यह वाक्य उस अधूरे प्यार की गहराई दिखाता है, जो कभी पूरा नहीं हुआ, लेकिन दिलों में हमेशा जिंदा रहा।
कर्ण और द्रौपदी का रिश्ता सिर्फ प्यार नहीं, बल्कि एक ऐ
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