कर्ण की मृत्यु और उसके बाद का सच

कर्ण की मृत्यु के बाद उनकी वीरता और दानशीलता पर कई कथाएं प्रचलित हुईं। लेकिन सबसे अनोखी बात यह है कि मृत्यु के समय भगवान कृष्ण स्वयं कर्ण के पास पहुंचे। वे ब्राह्मण के रूप में आए और उनसे भिक्षा मांगी। कर्ण, जो जीवनभर दान देने में विश्वास रखते थे, घायल होने के बावजूद उठे और अपने सिरहाट से एक सोने का कुंडल निकालकर दान में दे दिया।

इस घटना के बाद कृष्ण ने कहा कि कर्ण को दानवीर के रूप में सदा याद किया जाएगा। यह सुनकर अर्जुन आश्चर्यचकित हो गए और बोले – "कैसे वह सबसे बड़ा दानवीर हो सकता है?" तो कृष्ण ने समझाया कि जो व्यक्ति घायल हो, जीवन के अंतिम क्षणों में भी दान दे सके, उसकी तुलना कौन कर सकता है?

कर्ण ने न केवल युद्ध में बल्कि जीवन के सबसे कठिन पलों में भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनकी यही निस्वार्थता और दृढ़ता उन्हें अनमोल बनाती है। इसलिए आज भी लोग उनके नाम से दान की प्रेरण

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