गांधी जी और गीता: एक आत्मीय संबंध
महात्मा गांधी ने भगवद्गीता को अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक माना। उनका कहना था कि गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। उन्होंने इसे "शास्त्रों का दोहन" कहा—मानो सभी पुराने ज्ञान का सार एक साथ इकट्ठा किया गया हो।
गांधी जी ने गीता के श्लोकों पर अपनी टीका 'गीता माता' में लिखी, जहाँ उन्होंने गहरे अर्थ को सरल शब्दों में समझाया। उनका मानना था कि गीता का भक्त कभी भी निराश नहीं होता। वह चाहे कितनी भी कठिनाइयों में क्यों न हो, उसके मन में आनंद और शांति बनी रहती है।
उनके लिए गीता न केवल धर्म की पुस्तक थी, बल्कि एक ऐसा दर्पण थी जिसमें वे अपने संघर्षों का समाधान ढूंढ़ते थे। आजादी के संग्राम के उन तूफानी दिनों में भी वे गीता के सिद्धांतों से प्रेरणा लेते रहे।
गांधी जी कहते थे—“गीता मेरे लिए माता के समान है।” यही उनके जीवन की आत्मा थी—सत्य, अहिंसा और कर्म के माध्यम से म
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