आलस्य: जीवन का सबसे बड़ा शत्रु
हमारे शास्त्रों और महापुरुषों के कथनों में एक बात हमेशा समान रूप से कही गई है कि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यह एक ऐसा धीमा जहर है, जो व्यक्ति की सोचने-समझने और कार्य करने की क्षमता को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। आलस्य का शिकार व्यक्ति कभी भी अपने जीवन में उन्नति नहीं कर पाता है।
वास्तव में, आलस्य मनुष्य को इतना निकम्मा और कर्महीन बना देता है कि उसे परिश्रम से घृणा हो जाती है। वह मेहनत के मार्ग से भागने लगता है और सदैव केवल आराम की अवस्था में ही रहना चाहता है। जब कोई व्यक्ति कर्म करने के बजाय केवल आराम को चुनता है, तो वह अपने सुनहरे भविष्य के दरवाजे खुद बंद कर लेता है। समय किसी के लिए नहीं रुकता, और आलसी व्यक्ति हमेशा अवसरों को गंवा देता है।
जीवन में सफलता, मान-सम्मान और समृद्धि पाने का एकमात्र साधन कठिन परिश्रम है। आलस्य हमारे भीतर की रचनात्मकता और ऊर्जा को समाप्त कर देता है। इसलिए, यदि हमें जीवन में प्रगति करनी है और अपने सपनों को साकार करना है, तो इस आलस्य रूपी शत्रु का त्याग करना होगा। चुस्ती-फुर्ती और निरंतर प्रयास ही मानव जीवन को सार्थक और सफल बनाते हैं।
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