गाँव और शहर में अंतर: जीवन का अंदाज़ अलग
गाँव और शहर सुनने में तो बस दो शब्द लगते हैं, लेकिन इनके पीछे जीवन के दो अलग तरीके छिपे हैं। आमतौर पर, गाँव छोटे होते हैं, जहाँ लोग एक-दूसरे को नाम से जानते हैं। एक गाँव में अक्सर कोई मंदिर, मस्जिद या पूजा का स्थान ज़रूर होता है, साथ ही ऐसी जगह भी जहाँ लोग मिल-जुल कर बातचीत करें — जैसे बाज़ार, चौपाल या पंचायत भवन।
लेकिन जैसे-जैसे आबादी बढ़ती है और ज़रूरतें बदलती हैं, गाँव धीरे-धीरे बदलकर कस्बे या शहर बन जाते हैं। शहर में आबादी ज़्यादा घनी होती है। यहाँ स्थानीय सरकार होती है, जैसे नगर निगम या नगर पालिका, जो सफाई, बिजली, पानी जैसी सुविधाओं का इंतज़ाम करती है। साथ ही, शहर की सीमाएँ तय होती हैं, जो गाँव की तुलना में ज़्यादा संगठित होती हैं।
गाँव में जीवन धीमा और प्रकृति के करीब होता है, तो शहर में तेज़ रफ़्तार, भागदौड़ और आधुनिक सुविधाएँ। पर दोन
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