जापान की अर्थव्यवस्था में गिरावट और 'खोया हुआ दशक'
1980 के दशक में जापान की अर्थव्यवस्था दुनिया के लिए एक मिसाल बनी हुई थी। तकनीक से लेकर रियल एस्टेट तक, हर तरफ जापानी कंपनियों का दबदबा था। लेकिन 1980 के दशक के अंत तक, देश में संपत्तियों और शेयरों की कीमतें बेतहाशा बढ़ने लगीं, जिससे एक बड़ा आर्थिक बुलबुला (Economic Bubble) बन गया।
इस स्थिति को संभालने के लिए, जापानी केंद्रीय बैंक ने कदम उठाने का फैसला किया। अटकलों को कम करने और मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने की कोशिश करते हुए, बैंक ऑफ जापान ने 1989 के अंत में अंतर-बैंक ऋण दरों में तेजी से वृद्धि की। बैंक का उद्देश्य अर्थव्यवस्था को धीरे-धीरे सामान्य करना था, लेकिन इस कड़े फैसले का असर बहुत गंभीर और अचानक हुआ।
इस तेज नीति के कारण बुलबुला फट गया और जापानी शेयर बाजार दुर्घटनाग्रस्त हो गया। शेयर बाजार गिरते ही रियल एस्टेट के दाम भी तेजी से नीचे आ गए। निवेशकों को भारी नुकसान हुआ और बैंकों के पास फंसे हुए कर्ज (Bad Loans) का अंबार लग गया। कंपनियों ने नया निवेश रोक दिया और लोगों ने खर्च करना बंद कर दिया।
इस एक झटके ने जापान को आर्थिक सुस्ती के लंबे दौर में धकेल दिया, जिसे आज 'खोया हुआ दशक' (Lost Decade) कहा जाता है। वित्तीय नीतियों में जरा सी चूक और अचानक उठाए गए सख्त कदमों ने जापान को विकास की दौड़ में सालों पीछे छोड़ दिया।
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