माता-पिता का स्थान सर्वोपरि
हमारे समाज और प्राचीन शास्त्रों में माता-पिता तथा गुरु के स्थान को अत्यंत पवित्र और आदरणीय माना गया है। जीवन में ईश्वर की कृपा से भी बढ़कर हमारे संस्कारों और मार्गदर्शन का महत्व होता है। जब यह प्रश्न उठता है कि समाज या जीवन में सबसे बड़ा कौन है, तो हमारे शास्त्र इसका बहुत ही सुंदर उत्तर देते हैं।
शास्त्रों की व्याख्या के अनुसार, इस संसार में सबसे बड़े भगवान हैं। भगवान से भी बड़ा दर्जा गुरु को दिया गया है, क्योंकि गुरु ही हमें ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं। गुरु से भी बड़ा स्थान एक पिता का होता है, जो परिवार के संरक्षण और लालन-पालन के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। लेकिन जब बात आती है कि पिता से भी बड़ा कौन है, तो उत्तर स्पष्ट है—पिता से भी बड़ा स्थान माँ का होता है। माँ का निस्वार्थ प्रेम, त्याग और करुणा ही उन्हें सबसे ऊपर बनाती है।
रामायण में भी इस परंपरा और संस्कार का सुंदर वर्णन मिलता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम प्रतिदिन सुबह उठकर सबसे पहले अपनी माता, फिर पिता और उसके बाद गुरु के चरणों में माथा नवाते थे। यह हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे हम कितने भी बड़े पद पर पहुँच जाएँ, अपने माता-पिता और गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान ही हमारी असली पूँजी है।
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