बिहार की गरीबी: चुनौतियाँ और समाधान की राह

बिहार भारत का एक ऐसा राज्य है जिसका इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है, लेकिन वर्तमान में यह देश के सबसे गरीब राज्यों में गिना जाता है। आँकड़ों के अनुसार, बिहार की लगभग 33.74% आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है। वहीं, वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) के पैमाने पर यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है, जहाँ करीब 52.5% लोग बहुआयामी गरीबी के दायरे में आते हैं। इसका मतलब है कि यहाँ का एक बड़ा हिस्सा न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित है।

इस व्यापक गरीबी का सबसे बड़ा असर यहाँ के जनस्वास्थ्य पर दिख रहा है। बिहार में मात्र 12.3% परिवारों के पास ही हेल्थ इंश्योरेंस की सुविधा उपलब्ध है। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और जागरूकता के अभाव के कारण, 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 42% बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। यह स्थिति आने वाली पीढ़ी के शारीरिक और मानसिक विकास को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं। राज्य में 15 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की साक्षरता दर केवल 64.7% है। आधुनिक युग में बेहतर रोजगार के अवसरों के लिए शिक्षा और कौशल का होना अनिवार्य है, लेकिन साक्षरता की धीमी रफ्तार युवाओं को मुख्यधारा के आर्थिक विकास से दूर रखती है। इसके अलावा, राज्य में बड़े उद्योगों की कमी, कृषि पर अत्यधिक निर्भरता और हर साल आने वाली बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ इस समस्या को और जटिल बना देती हैं।

बिहार को इस चक्रव्यूह से निकालने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी ढांचे में भारी निवेश की जरूरत है, ताकि यहाँ के मानव संसाधन को एक ताकत में बदला जा सके।

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