भारत द्वारा दिया गया कर्ज और देश की आर्थिक स्थिति
अक्सर लोग सोचते हैं कि विदेशी कर्ज का मतलब केवल दूसरों से पैसे लेना होता है, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था में लेन-देन दोनों तरफ से चलता है। भारत ने भी अपने पड़ोसी और मित्र देशों को उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने और विकास परियोजनाओं के लिए अरबों डॉलर का कर्ज और वित्तीय सहायता दी है। श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और मालदीव जैसे देशों को बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए समय-समय पर भारत से बड़ी मदद मिलती रही है।
हाल के आंकड़ों के अनुसार, भारत का खुद का बाह्य कर्ज मार्च 2022 के अंत में बढ़कर 620.7 अरब डॉलर पहुंच गया था, जिसमें पिछले वर्ष के मुकाबले 8.2 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस विदेशी कर्ज में सबसे बड़ा हिस्सा, लगभग 53.2 फीसदी, अमेरिकी डॉलर में है, जबकि 31.2 फीसदी हिस्सा भारतीय रुपये में देय है। इसका मतलब है कि देश को अपने वैश्विक लेन-देन और कर्ज के भुगतान में डॉलर की स्थिति पर काफी निर्भर रहना पड़ता है।
किसी भी देश के लिए कर्ज लेना और दूसरों को वित्तीय मदद देना उसकी मजबूत अंतरराष्ट्रीय नीतियों और कूटनीति का हिस्सा होता है। भारत अपनी अर्थव्यवस्था को संतुलित रखते हुए न केवल विदेशी देनदारियों का प्रबंधन कर रहा है, बल्कि दुनिया भर में एक मजबूत आर्थिक साझेदार के रूप में अपनी पहचान भी बना रहा है।
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