लक्ष्मी जी भगवान विष्णु के पैर क्यों दबाती हैं?

सनातन धर्म में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की जोड़ी को सृष्टि के संतुलन और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। अक्सर धार्मिक चित्रों और मूर्तियों में देखा जाता है कि माता लक्ष्मी क्षीर सागर में शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु के चरण दबा रही हैं। इसके पीछे कई गहरे आध्यात्मिक, पौराणिक और व्यावहारिक कारण छिपे हैं, जो हमें जीवन की बड़ी सीख देते हैं।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार देवर्षि नारद ने माता लक्ष्मी से यही सवाल पूछा था। तब लक्ष्मी जी ने बताया था कि ग्रहों का प्रभाव केवल मनुष्यों पर ही नहीं, बल्कि देवी-देवताओं पर भी होता है। महिलाओं के हाथ में बृहस्पति (गुरु) का वास होता है और पुरुषों के पैरों में शनिदेव का वास माना जाता है। जब कोई स्त्री अपने पति के चरण दबाती है, तो गुरु और शनि का मिलाप होता है, जिससे धन, समृद्धि और सौभाग्य की वृद्धि होती है। यह क्रिया दोनों के जीवन से दुर्भाग्य को दूर रखती है।

आध्यात्मिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखें तो यह कोई दासी प्रथा नहीं है, बल्कि यह परस्पर सम्मान, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है। भगवान विष्णु सृष्टि के पालनहार हैं, जो संसार के कल्याण के लिए निरंतर कार्यरत रहते हैं। माता लक्ष्मी द्वारा उनके पैर दबाना उनके प्रति कृतज्ञता और सेवा भाव को दर्शाता है।

यह कथा हमें सिखाती है कि एक आदर्श वैवाहिक जीवन में पति-पत्नी को एक-दूसरे का पूरक होना चाहिए। जहां विष्णु जी कर्म और उत्तरदायित्व का प्रतीक हैं, वहीं लक्ष्मी जी चंचलता को शांत कर स्थिरता लाने वाली शक्ति हैं। दोनों का यह तालमेल ही संसार में सुख-शांति बनाए रखता है।

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