याद आता था घर का सब कुछ

कॉलेज के दिन थे। लेखक शहर में पढ़ाई कर रहा था, पहली बार घर से दूर। छोटी-छोटी बातें उसे घर की याद दिला देती थीं। कभी खाने में गरम रोटी न मिलने पर, तो कभी बारिश में भीग जाने पर उसके चेहरे पर उदासी छा जाती।

मित्र इसी का मजाक उड़ाते थे।

वे कहते, "अरे फिर घर याद आ गया क्या? बस थोड़ी बारिश हुई, और तू गृहस्थ बन गया!" उन्हें लगता था कि लेखक थोड़ा ज्यादा ही भावुक है। लेकिन सच तो यह था कि लेखक अपने परिवार, गाँव की शांति और घर की सुगंध से दूर होकर अकेला महसूस करता था।

उसके मित्र ताने मारते, लेकिन दिल से उसका साथ देते। वो जानते थे कि यह लगाव कमजोरी नहीं, बल्कि प्यार की गहराई थी। कई बार तो वे उसके साथ बैठकर उसके गाँव की बातें सुनते, जैसे वहाँ की नदी कैसी है, माँ का खाना कैसा स्वादिष्ट होता है।

मजाक उड़ाना भी एक तरह का प्यार था।

धीरे-धीरे लेखक भी मुस्कुराकर अपनी यादों को साझा करने लगा। वो जान गया कि घ

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