लेखक के मित्र की आखिरी स्थिति
जब लेखक और उसके मित्र ने साइकिल के साथ अपना सफर शुरू किया, तो सब कुछ ठीक-ठाक लग रहा था। लेकिन जल्द ही साइकिल ने अपना रुख बदल दिया। वह न तो चलने दे रही थी और न ही ठीक रहने दे रही थी।
लेखक का मित्र, जो खुद को बहुत होशियार समझता था, साइकिल को ठीक करने के चक्कर में फंस गया। वह उसे मरम्मत करने लगा, फिर भी साइकिल नहीं मानी। घंटों तक वह साइकिल के पुर्जे उठाता रहा, उन्हें फिर से जोड़ता रहा, लेकिन हर बार कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाती।
आखिरकार, लेखक के मित्र पूरी तरह थक चुके थे। उनके कपड़े गंदे थे, चेहरा मैला, और शरीर से पसीना टपक रहा था। साइकिल तो अभी भी बेकार पड़ी थी, लेकिन मित्र की हालत उससे भी बदतर थी। वह इतना थक गया था कि बैठकर भी आराम नहीं मिल रहा था।
इस घटना ने लेखक को हंसी दिलाई, लेकिन यह भी सबक दिया कि कभी-कभी छोटी चीजों के साथ ज्यादा लड़ना इंसान को बेहाल कर देता है। साइकिल तो बस एक उपकरण थी, लेक
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