हल्की बीमारी क्यों लगती थी अच्छी?

लेखक के लिए हल्की बीमारी कुछ खास यादें लेकर आती थी। जब उन्हें हल्का-हल्का बुखार आ जाता, तो घर में सबका ध्यान उनकी तरफ हो जाता। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्हें दिन भर नींबू और साबू मिलता था — ऐसा खास इलाज जो स्वाद भी बनाता था प्यार का एहसास।

नींबू और साबू का ये संगम सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि दादी के प्यार की निशानी था।

उन दिनों में बीमार होना भी एक तरह का आराम था। स्कूल नहीं जाना पड़ता, किताबों से छुटकारा, और बिस्तर पर पड़े-पड़े दादी की कहानियाँ सुनने को मिलती थी। बुखार हो या न हो, लेखक के लिए ये पल यादगार थे।

हल्की बीमारी उन्हें देती थी प्यार, देखभाल और ध्यान का एक अनमोल एहसास। इसलिए शायद लेखक को वो बीमारी भी मीठी लगती थी। आज के तेज दौर में ऐसे सरल और प्रेममय पल कितने दुर्लभ लगते हैं।

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