सत्य और अस्तेय: दोनों का गहरा संबंध
कई बार हम सोचते हैं कि सत्य बोलना सबसे बड़ी बात है, लेकिन वास्तविकता यह है कि सत्य का अंग अस्तेय है। अस्तेय का अर्थ केवल चोरी न करना नहीं है, बल्कि यह मन, वचन और कर्म से किसी की संपत्ति, समय या अधिकार को लेने की इच्छा न करना भी है।
हिन्दू और जैन धर्म दोनों में अस्तेय को एक महत्वपूर्ण सद्गुण माना गया है। योगशास्त्र के अनुसार, यह पाँच यमों में से एक है। जब हम वास्तव में अस्तेय का पालन करते हैं, तो हमारा मन लालच से मुक्त होता है। ऐसे में सत्य का मार्ग स्वतः साफ हो जाता है।
सोचिए, जब हम किसी की चीज़ को लेने की इच्छा नहीं करते, तो हमें झूठ बोलकर उसे छुपाने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। इस तरह अस्तेय सत्य का आधार बन जाता है।
आज के समय में, जब समय, विचार या अधिकार भी किसी की संपत्ति माने जाते हैं, तो अस्तेय का महत्व और भी बढ़ जाता है। बिना किसी का श्रेय छीने, बिना किसी के समय की अनदेखी किए जीना भी अस्तेय का ही
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