जब आधी रात को पूरा देश चैन की नींद सो रहा होता है, तब सरहद के पार या समंदर की अतल गहराइयों में कुछ साए खामोशी से मौत का खेल खेल रहे होते हैं। भारतीय सेना के पास कोई एक 'सबसे बड़ा' कमांडो नहीं है, बल्कि देश की संप्रभुता को अक्षुण्ण रखने वाली तीन मुख्य विशेष बल इकाइयां—पैरा एसएफ, मार्कोस और गरुड़—संयुक्त रूप से इस शीर्ष स्थान पर काबिज हैं। ये आम सैनिक नहीं, बल्कि अत्याधुनिक हथियारों से लैस ऐसे अदम्य योद्धा हैं जो पलक झपकते ही दुश्मन का नामोनिशान मिटा देने की अचूक क्षमता रखते हैं।

विशेष बलों का प्रादुर्भाव और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय सैन्य इतिहास में विशिष्ट अभियानों के लिए एक अलग बल की आवश्यकता सबसे पहले 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान महसूस की गई। उस वक्त मेघदूत फोर्स नामक एक छोटी टुकड़ी ने दुश्मन के खेमे में तबाही मचाई थी, जिसने बाद में थल सेना के 'पैरा स्पेशल फोर्सेज' (Para SF) का रूप ले लिया। समय बदला और देश के सामने समुद्री आतंकवाद और समुद्री डकैती की नई चुनौतियां उभरकर सामने आईं। इसी के परिणामस्वरूप 1987 में नौसेना ने अपने सबसे घातक विंग 'मार्कोस' (MARCOS - Marine Commandos) की स्थापना की, जिन्हें 'मगरमच्छ' भी कहा जाता है। इसके बाद, साल 2004 में वायुसेना ने अपने रणनीतिक हवाई ठिकानों की सुरक्षा और हवाई बचाव कार्यों के लिए 'गरुड़' कमांडो फोर्स का गठन किया। इन बलों का निर्माण किसी सामान्य युद्ध के लिए नहीं, बल्कि अपरंपरागत युद्ध प्रणालियों और आतंकवाद के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक जैसे बेहद जटिल ऑपरेशनों को अंजाम देने के लिए किया गया था।

चयन से संहारक बनने तक की बेहद कठिन प्रक्रिया

इन विशिष्ट बलों का हिस्सा बनना लोहे के चने चबाने जैसा है। चयन प्रक्रिया के पहले चरण में केवल उन्हीं सैनिकों को मौका मिलता है जो शारीरिक और मानसिक रूप से पहले से ही सर्वश्रेष्ठ होते हैं। इसके बाद शुरू होता है 'प्रोबेशन पीरियड', जो आमतौर पर तीन से छह महीने तक चलता है। इस दौरान वॉलंटियर्स को 'हेल वीक' यानी नर्क के सप्ताह से गुजरना पड़ता है, जहां उन्हें लगातार कई दिनों तक सोने नहीं दिया जाता और अत्यधिक शारीरिक प्रताड़ना के बीच रणनीतिक फैसले लेने होते हैं। अगले चरण में, मरुस्थल की तपती रेत से लेकर सियाचिन की शून्य से चालीस डिग्री नीचे की हाड़ कपाने वाली ठंड में जीवित रहने (Survival Training) का कड़ा प्रशिक्षण दिया जाता है। अंतिम चरण में, इन्हें आधुनिकतम इजरायली टैवोर राइफल्स, क्लोज क्वार्टर बैटल (CQB) तकनीकों, और आसमान से हजारों फीट की ऊंचाई से छलांग लगाने वाली 'हाहो' (HAHO) और 'हालो' (HALO) डाइविंग में पारंगत किया जाता है, जिसके बाद ही इन्हें प्रतिष्ठित 'बलिदान बैज' या विशिष्ट मेरून बेरे सौंपी जाती है।

ऑपरेशन कैक्टस: जांबाजी का एक जीवंत उदाहरण

नवंबर 1988 में मालदीव में तख्तापलट की कोशिश हुई, जहां भाड़े के सशस्त्र विद्रोहियों ने वहां के राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम को बंधक बनाने का प्रयास किया। मालदीव सरकार की गुहार पर भारत ने तुरंत अपने पैरा कमांडो को भेजने का निर्णय लिया। इस मिशन को 'ऑपरेशन कैक्टस' नाम दिया गया। भारतीय वायुसेना के विमानों से पैरा कमांडो रात के अंधेरे में हुलहुले द्वीप पर उतरे। बिना किसी पूर्व खुफिया जानकारी या स्थानीय नक्शों के, इन जांबाज कमांडो ने चंद घंटों के भीतर हवाई अड्डे को अपने नियंत्रण में ले लिया और विद्रोहियों को चारों खाने चित कर दिया। उन्होंने न केवल राष्ट्रपति गयूम को सुरक्षित बचाया बल्कि समुद्र के रास्ते भाग रहे विद्रोहियों को भी बीच मजधार में दबोच लिया। इस सफल सैन्य कार्रवाई ने वैश्विक स्तर पर भारतीय कमांडो की त्वरित सूझबूझ, अदम्य साहस और बेजोड़ युद्ध क्षमता का लोहा मनवाया।

विशेषज्ञों की राय (Experts View)

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की विभिन्न कमांडो ताकतों में से किसी एक को 'सबसे बड़ा' या 'सर्वश्रेष्ठ' चुनना व्यावहारिक रूप से सही नहीं है। सेना के रणनीतिकारों के अनुसार, पैरा एसएफ (Para SF), मार्कोस (MARCOS), और गरुड़ (Garud) जैसी सभी विशेष इकाइयां अपने-अपने कार्यक्षेत्र में सर्वोच्च हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि जहां मार्कोस पानी के भीतर गुप्त अभियानों के बेताज बादशाह हैं, वहीं पैरा एसएफ पहाड़ी और मैदानी इलाकों में सर्जिकल स्ट्राइक के उस्ताद हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, इन बलों की ताकत का असली आकलन उनकी संख्या से नहीं, बल्कि उनके अत्यंत कठिन चयन प्रक्रिया और 'जीरो एरर' (Zero Error) मिशन सफलता दर से होता है। वे देश की सुरक्षा के अग्रिम सुरक्षा कवच हैं, जिनकी तुलना किसी अन्य से नहीं की जा सकती।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: भारत की सबसे पुरानी और सबसे खतरनाक कमांडो फोर्स कौन सी है?

उत्तर: भारतीय सेना की पैरा स्पेशल फोर्सेज (Para SF) को भारत की सबसे पुरानी और बेहद खतरनाक स्पेशल फोर्स माना जाता है, जिसका गठन 1966 में हुआ था। समुद्री अभियानों की बात करें तो नौसेना के मार्कोस (MARCOS) कमांडो को दुनिया के सबसे खूंखार बलों में गिना जाता है, जिनकी ट्रेनिंग अमेरिकी नेवी सील्स की तर्ज पर होती है।

प्रश्न 2: एनएसजी (NSG) और पैरा एसएफ (Para SF) कमांडो में क्या अंतर है?

उत्तर: पैरा एसएफ सीधे भारतीय सेना के नियंत्रण में काम करती है और मुख्य रूप से युद्ध के दौरान दुश्मन की सीमा के पीछे जाकर सैन्य अभियानों को अंजाम देती है। इसके विपरीत, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) एक गृह मंत्रालय के अधीन आने वाली आतंकवाद-रोधी विशिष्ट इकाई है, जिसका उपयोग देश के भीतर बंधक संकट, विमान अपहरण और हाई-प्रोफाइल आतंकी हमलों (जैसे 26/11 मुंबई हमला) से निपटने के लिए किया जाता है।

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एक विचारणीय सवाल

जब हमारी जल, थल और नभ की तीनों विशिष्ट ताकतें बिना कोई सुराग छोड़े किसी भी वैश्विक चुनौती को पलक झपकते ही नेस्तनाबूद करने की क्षमता रखती हैं, तो क्या वाकई इन्हें किसी एक नंबर या रैंक के तराजू में तौलना हमारे इन जांबाजों के सर्वोच्च बलिदान और अद्वितीय शौर्य के साथ न्याय होगा?