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कोलकाता के टेंगरा में जब सुबह-सुबह नूडल्स सूप की खुशबू हवा में तैरती है, तो भारत-चीन संबंधों की कड़वाहट एक पल के लिए थम जाती है। अगर आप सोचते हैं कि भारत में लाखों चीनी नागरिक रह रहे हैं, तो आप बिल्कुल गलत हैं। एक चौंकाने वाला सच यह है कि आधिकारिक और अनौपचारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में मूल चीनी वंश (Han Chinese) के लोगों की संख्या अब सिमटकर केवल 5,000 से 7,000 के बीच रह गई है, जिसमें कुछ हजार चीनी कॉरपोरेट कर्मचारी भी शामिल हैं जो दो-तीन साल के अनुबंध पर यहाँ आते हैं। सदियों पुराने ऐतिहासिक संबंधों वाले इस विशाल देश में यह संख्या आश्चर्यजनक रूप से बेहद मामूली है।
प्रवासन का कूटनीतिक और ऐतिहासिक सफरनामा
भारत में चीनी नागरिकों के बसने की कहानी आज की नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध अठारहवीं शताब्दी के अंत से है। पहला दर्ज चीनी अप्रवासी 'टॉन्ग अचिव' नाम का एक चाय व्यापारी था, जो 1778 के आसपास वारेन हेस्टिंग्स के शासनकाल में कलकत्ता (अब कोलकाता) के पास आकर बसा था। उसने हुगली नदी के किनारे गन्ने की मिल लगाई, और उसी के नाम पर उस जगह का नाम 'अचीपुर' पड़ा। इसके बाद, दक्षिणी चीन के गुआंगडोंग और फुजियान प्रांतों से बड़ी संख्या में हक्का और कैंटोनीज़ लोग भारत आने लगे। वे मुख्य रूप से चमड़ा उद्योग, जूता निर्माण, रेशम व्यापार और दंत चिकित्सा जैसे पेशों में माहिर थे। धीरे-धीरे कोलकाता का 'टायरट्टा बाजार' और 'टेंगरा' देश का इकलौता जीवंत चाइनाटाउन बन गया। हालांकि, 1962 के भारत-चीन युद्ध ने इस पूरी बिरादरी की रीढ़ तोड़ दी, जब राष्ट्रीय सुरक्षा के संदेह में हजारों चीनी-भारतीयों को राजस्थान के देवली कैंप में नजरबंद कर दिया गया। उस कड़वे अनुभव के बाद, इस आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान पलायन कर गया, जिससे इनकी संख्या लगातार घटती चली गई।
यह जनसांख्यिकीय चक्र व्यावहारिक रूप से कैसे काम करता है?
वर्तमान समय में भारत में चीनी नागरिकों की मौजूदगी को समझने के लिए हमें इसके आंतरिक तंत्र और श्रेणियों को चरण-दर-चरण देखना होगा, क्योंकि यह कोई सामान्य आव्रजन नहीं है।
पहला चरण: बहु-पीढ़ीगत चीनी-भारतीय नागरिक
ये वे लोग हैं जिनके दादा-परदादा चीन से आए थे। इनके पास भारतीय पासपोर्ट है, ये हिंदी और बंगाली धाराप्रवाह बोलते हैं, लेकिन घर में हक्का भाषा का प्रयोग करते हैं। इनकी नागरिकता पूरी तरह भारतीय है, लेकिन नस्ल चीनी है। कोलकाता और मुंबई में इनकी आबादी अब महज कुछ हजार बची है।
दूसरा चरण: कॉर्पोरेट प्रवासी और तकनीकी विशेषज्ञ
वैश्वीकरण के दौर में, वीवो, ओप्पो, श्याओमी जैसी चीनी तकनीकी कंपनियों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के आने से चीनी पेशेवरों का एक नया समूह भारत आया। ये लोग दिल्ली-एनसीआर (गुरुग्राम), बेंगलुरु और मुंबई जैसे औद्योगिक केंद्रों में रहते हैं।
तीसरा चरण: सख्त वीजा और आव्रजन नियमन
भारत सरकार का गृह मंत्रालय चीनी नागरिकों के लिए बेहद सख्त 'बिजनेस वीजा' (B-Visa) और 'एम्प्लॉयमेंट वीजा' (E-Visa) नीतियां लागू करता है। हर चीनी नागरिक को भारत आने के बाद 'विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय' (FRRO) में अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराना होता है।
चौथा चरण: अल्पकालिक प्रवास और वापसी
हालिया भू-राजनीतिक तनावों और सख्त कूटनीतिक जांच के कारण, चीनी नागरिकों को अब दीर्घकालिक निवास परमिट नहीं मिलते। वे आमतौर पर 1 से 3 साल के सीमित कार्य अनुबंध पर आते हैं और अवधि समाप्त होते ही वापस बीजिंग या शंघाई लौट जाते हैं।
एक वास्तविक मिसाल: कोलकाता के टेंगरा का सिमटता समुदाय
इस पूरी स्थिति को समझने के लिए कोलकाता के प्रसिद्ध टेंगरा इलाके का उदाहरण देखना सबसे सटीक होगा। साठ के दशक की शुरुआत में अकेले कोलकाता में करीब 20,000 से अधिक चीनी मूल के लोग रहते थे। चमड़े के कारखाने (टैनरी) पूरी तरह उनके नियंत्रण में थे और उनका अपना एक आत्मनिर्भर समाज था। लेकिन जब पर्यावरण नियमों के कारण टैनरियों को शहर से बाहर स्थानांतरित किया गया और कूटनीतिक दूरियां बढ़ीं, तो इस समुदाय का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। आज टेंगरा में पुरानी चीनी शैली के टैनरियों की जगह बड़े-बड़े इंडो-चाइनीज रेस्तरां ने ले ली है। वहाँ रहने वाले डोमिनिक ली जैसे तीसरी पीढ़ी के उद्यमी अब सॉस बनाने और रेस्तरां चलाने के पारंपरिक पुश्तैनी काम को तो संभाल रहे हैं, लेकिन उनके बच्चे उच्च शिक्षा के लिए विदेश जा रहे हैं। टेंगरा की गलियों में आज चीनी नए साल पर ड्रैगन डांस तो होता है, लेकिन उसमें भाग लेने वाले चेहरे अब साल-दर-साल कम होते जा रहे हैं, जो यह साफ दर्शाता है कि आधुनिक भारत में चीनी प्रवासियों का वजूद धीरे-धीरे एक इतिहास बनता जा रहा है।
इस विषय पर विशेषज्ञों का क्या कहना है?
भारत और चीन के जनसांख्यिकीय संबंधों पर नजर रखने वाले नीतिगत विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में चीनी नागरिकों की संख्या को दो अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखा जाना चाहिए। पहले समूह में वे पारंपरिक चीनी-भारतीय परिवार आते हैं, जो सदियों पहले कोलकाता (टैंगरा और टायरेटा बाजार) और मुंबई में आकर बस गए थे। विशेषज्ञों के अनुसार, 1962 के युद्ध के बाद इस स्थायी समुदाय की आबादी में भारी गिरावट आई और अब इनकी संख्या महज कुछ हजार रह गई है।
दूसरी ओर, कॉर्पोरेट और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े चीनी प्रवासियों (Expatriates) का एक आधुनिक समूह है। भू-राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि साल 2020 की गलवान घाटी घटना और उसके बाद भारत सरकार द्वारा वीजा नियमों में की गई सख्ती के कारण तकनीकी विशेषज्ञों और व्यावसायिक वीजा पर भारत आने वाले चीनी नागरिकों की संख्या में काफी कमी आई है। वर्तमान में सुरक्षा जांच और सख्त एफआरआरओ (FRRO) नियमों के कारण केवल बेहद जरूरी परियोजनाओं के लिए ही चीनी नागरिकों को भारत में रहने की अनुमति मिल पा रही है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारत के किन शहरों में सबसे ज्यादा चीनी नागरिक या चीनी मूल के लोग रहते हैं?
ऐतिहासिक रूप से कोलकाता और मुंबई चीनी मूल के स्थायी नागरिकों के मुख्य केंद्र रहे हैं, जहां आज भी देश के चुनिंदा 'चाइनाटाउन' मौजूद हैं। इसके विपरीत, आधुनिक चीनी कामकाजी प्रवासी मुख्य रूप से दिल्ली-एनसीआर (जैसे गुरुग्राम), बेंगलुरु और मुंबई जैसे प्रमुख कॉर्पोरेट हब में निवास करते हैं, जहां वे चीनी स्मार्टफोन कंपनियों, तकनीकी विनिर्माण इकाइयों और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में कार्यरत हैं।
2. क्या चीनी नागरिकों के लिए भारत में रहने के नियम हाल के दिनों में बदले हैं?
हाँ, भारत सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए चीनी नागरिकों के लिए वीजा और निवास नियमों को बेहद कड़ा कर दिया है। अब चीनी नागरिकों के लिए बिजनेस और एम्प्लॉयमेंट वीजा की समीक्षा गहन खुफिया जांच के बाद ही की जाती है। इसके अलावा, भारत में उनके प्रवास की अवधि और स्थानीय गतिविधियों पर विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) द्वारा लगातार सख्त निगरानी रखी जाती है।
एक विचारणीय प्रश्न
बदलते वैश्विक समीकरणों और दोनों देशों के बीच जारी सीमा विवादों के बीच, क्या भविष्य में आर्थिक निर्भरता भारत और चीन के इन सामाजिक-सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय संबंधों को फिर से सामान्य कर पाएगी, या फिर भारत में सिमटती चीनी आबादी हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएगी?
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