विषय-सूची
- 1. बिहार की वित्तीय पृष्ठभूमि और कर्ज के बढ़ने की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- 2. प्रति व्यक्ति कर्ज के निर्धारण की क्रमिक प्रक्रिया और गणना का तंत्र
- 3. एक व्यावहारिक मिसाल और प्रति व्यक्ति कर्ज का यथार्थवादी प्रभाव
- 4. What experts say about it
- 5. Frequently Asked Questions
- 6. क्या भविष्य में यह कर्ज का बोझ बिहार के युवाओं के लिए एक अदृश्य टैक्स बनकर रह जाएगा?
हालिया आर्थिक आंकड़ों के अनुसार, बिहार पर कुल बकाया ऋण बढ़कर लगभग 3.74 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो राज्य के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का लगभग 37.7 प्रतिशत है। इस भारी भरकम वित्तीय ढांचे के बीच जब प्रति व्यक्ति कर्ज का हिसाब लगाया जाता है, तो हर नागरिक के हिस्से में एक निश्चित राशि आती है। यह वित्तीय दायित्व इस बात का परिचायक है कि राज्य अपनी विकासात्मक और कल्याणकारी योजनाओं को गति देने के लिए किस सीमा तक उधार पर निर्भर है।
बिहार की वित्तीय पृष्ठभूमि और कर्ज के बढ़ने की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
बिहार की आर्थिकी लंबे समय से ऐतिहासिक संचयी चुनौतियों और संसाधनों की तंगी से जूझती रही है। जब राज्य के वित्तीय इतिहास का अवलोकन करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि बुनियादी ढांचे के निर्माण, ग्रामीण विद्युतीकरण, सड़क नेटवर्क और सामाजिक कल्याण की योजनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए सरकारों को लगातार उधार लेना पड़ा है। अतीत के दशकों में औद्योगिक निवेश की कमी और कम कर संग्रह के कारण राज्य अपनी राजस्व प्राप्तियों से संपूर्ण विकास व्यय को पूरा करने में अक्षम रहा है। परिणामस्वरूप, वित्तीय घाटे को पाटने के लिए केंद्रीय ऋणों और खुले बाजार से उधार लेने की संस्कृति गहरी होती गई, जिससे समय के साथ राज्य के कुल कर्ज के आंकड़े में लगातार इजाफा होता देखा गया है।
प्रति व्यक्ति कर्ज के निर्धारण की क्रमिक प्रक्रिया और गणना का तंत्र
किसी भी राज्य में प्रति व्यक्ति कर्ज की गणना करने के लिए एक सीधा गणितीय सूत्र और प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाई जाती है। सबसे पहले, राज्य के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (कैग) और वित्त विभाग के वार्षिक बजट दस्तावेजों से उस वित्तीय वर्ष के अंत तक के कुल बकाया सार्वजनिक ऋण को निकाला जाता है। इसके पश्चात, इस कुल ऋण राशि को राज्य की कुल अनुमानित जनसंख्या से विभाजित किया जाता है। इस प्रक्रिया में आंतरिक ऋण, वित्तीय संस्थानों और बैंकों से लिए गए बाजार कर्ज, तथा केंद्र सरकार से प्राप्त अग्रिम ऋणों को शामिल किया जाता है। जब कुल 3.74 लाख करोड़ रुपये से अधिक के बकाया ऋण को बिहार की करोड़ों की आबादी से भाग दिया जाता है, तो प्रति व्यक्ति पर आने वाला आर्थिक बोझ स्पष्ट रूप से सामने आता है, जो यह दर्शाता है कि राज्य के प्रत्येक निवासी के नाम पर सांकेतिक रूप से कितनी उधारी दर्ज है।
एक व्यावहारिक मिसाल और प्रति व्यक्ति कर्ज का यथार्थवादी प्रभाव
इस अवधारणा को बेहतर ढंग से समझने के लिए एक व्यावहारिक उदाहरण पर गौर करते हैं। मान लीजिए कि एक औसत मध्यम वर्गीय परिवार, जिसमें पांच सदस्य रहते हैं, वह अपनी आजीविका के लिए सरकार की विभिन्न योजनाओं पर निर्भर है। यदि राज्य का कुल प्रति व्यक्ति कर्ज लगभग तीस से इकतीस हजार रुपये के आसपास आंका जाता है, तो उस पांच सदस्यों वाले परिवार पर वैचारिक रूप से डेढ़ लाख रुपये से अधिक का वित्तीय दायित्व अप्रत्यक्ष रूप से निहित माना जा सकता है। यह कर्ज केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह भविष्य के करों, विकास के लिए मिलने वाले संसाधनों के आवंटन और बुनियादी सेवाओं की गुणवत्ता को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। इससे यह भी पता चलता है कि जब राज्य सरकारें कल्याणकारी योजनाओं के लिए भारी कर्ज लेती हैं, तो उसका दूरगामी असर अंततः आम जनता के आर्थिक ताने-बाने पर ही पड़ता है।
What experts say about it
अर्थशास्त्रियों और वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी विकासशील राज्य के लिए कर्ज लेना पूरी तरह से गलत नहीं है, बशर्ते उस ऋण का उपयोग उत्पादक परिसंपत्तियों, बुनियादी ढांचे और दीर्घकालिक विकास योजनाओं में किया जाए। हालांकि, बिहार के मामले में चिंता का विषय यह है कि राज्य के कुल बजट का एक बड़ा हिस्सा पुराने कर्जों के ब्याज चुकाने में खर्च हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक राज्य का औद्योगिक विकास तेजी से नहीं होता और प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के करीब नहीं पहुंचती, तब तक बढ़ते कर्ज का यह बोझ राज्य की वित्तीय स्थिति पर दबाव बना सकता है। इसके अलावा, लोकलुभावन योजनाओं और मुफ्त सौगातों के कारण प्रशासनिक खर्चों में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। नीति निर्माताओं के अनुसार, वित्तीय अनुशासन और राजस्व संग्रह में सुधार किए बिना इस चक्र से बाहर निकलना बेहद कठिन होगा।
Frequently Asked Questions
बिहार सरकार मुख्य रूप से कहां से कर्ज लेती है?
बिहार सरकार मुख्य रूप से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के माध्यम से सरकारी प्रतिभूतियों (G-Sec) और बॉन्ड जारी करके बाजार से कर्ज जुटाती है। इसके अलावा, केंद्र सरकार से मिलने वाले विशेष केंद्रीय ऋण, वित्तीय संस्थानों जैसे नाबार्ड (NABARD), और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों से मिलने वाली सहायता भी राज्य के कुल ऋण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं।
क्या प्रति व्यक्ति कर्ज बढ़ने से आम नागरिक पर सीधा असर पड़ता है?
हाँ, प्रति व्यक्ति कर्ज का सीधा असर आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। जब सरकार पर ऋण का बोझ अधिक होता है, तो बजट का एक बड़ा हिस्सा विकास कार्यों और जनहित योजनाओं के बजाय केवल ब्याज चुकाने में चला जाता है। इसके परिणामस्वरूप शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए कम फंड बच पाता है, और कई बार सरकार को विकास खर्च पूरा करने के लिए करों या शुल्कों में वृद्धि करनी पड़ती है।
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