अरब सागर की नीली लहरों के बीच बसे केवल बत्तीस वर्ग किलोमीटर के छोटे से भूभाग ने संपूर्ण भारत में एक मिसाल कायम कर दी है। क्या आप जानते हैं कि देश का सबसे छोटा केंद्रशासित प्रदेश होने के बावजूद लक्षद्वीप ने कृषि के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कीर्तिमान रचा है? जी हाँ, लक्षद्वीप आधिकारिक रूप से भारत का पहला ऐसा केंद्रशासित प्रदेश बन गया है जिसे सौ प्रतिशत जैविक कृषि क्षेत्र घोषित किया गया है। यहाँ की बंजर और रेतीली भूमि पर बिना किसी सिंथेटिक उर्वरक के जीवन और हरियाली पनपती है।

लक्षद्वीप में जैविक कृषि की पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक शुरुआत

प्रकृति ने इस द्वीप समूह को असीम सौंदर्य के साथ-साथ अत्यंत नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान किया है। मुख्य भूमि से दूर स्थित होने के कारण यहाँ के निवासियों ने पीढ़ियों से अपनी स्थानीय परंपराओं और आनुवंशिक बुद्धिमत्ता पर भरोसा किया है। आधुनिक रासायनिक खादों का प्रभाव यहाँ कभी गहराई तक पहुँच ही नहीं पाया। वर्ष 2017 में लक्षद्वीप प्रशासन ने एक दूरदर्शी कदम उठाते हुए यहाँ रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के आयात, बिक्री तथा उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। इस नीतिगत निर्णय का मुख्य उद्देश्य यहाँ के भू-जल और कोरल रीफ यानी प्रवाल भित्तियों को जहरीले रसायनों के दुष्प्रभावों से बचाना था। धीरे-धीरे इस द्वीप के किसानों ने पूरी तरह से पारंपरिक और प्राकृतिक खेती के तौर-तरीकों को अपना लिया, जिससे यह क्षेत्र स्वाभाविक रूप से रसायन-मुक्त बन गया।

जैविक खेती की प्रक्रिया और भागीदारी गारंटी प्रणाली का क्रियान्वयन

किसी भी क्षेत्र को केवल मौखिक रूप से जैविक कह देना पर्याप्त नहीं होता, इसके लिए कठोर मानकों और प्रमाणन की आवश्यकता होती है। लक्षद्वीप में इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केंद्र सरकार की परंपरागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत 'भागीदारी गारंटी प्रणाली' यानी पीजीएस-इंडिया को लागू किया गया। इस चरणबद्ध प्रक्रिया के तहत सबसे पहले स्थानीय किसानों को छोटे-छोटे समूहों में संगठित किया गया। कृषि विज्ञान केंद्र और स्थानीय प्रशासन ने मिलकर किसानों को जैविक प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य परीक्षण और प्राकृतिक खाद निर्माण का गहन प्रशिक्षण दिया। रासायनिक अवशिष्टों की अनुपस्थिति की बार-बार जाँच की गई और अंततः संपूर्ण कृषि योग्य भूमि को आधिकारिक तौर पर 'लार्ज एरिया सर्टिफ़िकेशन' के अंतर्गत जैविक प्रमाणित कर दिया गया, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि यहाँ उत्पन्न होने वाला प्रत्येक नारियल और कृषि उत्पाद पूरी तरह शुद्ध है।

नारियल उत्पादन और आजीविका का एक वास्तविक मॉडल

इस परिवर्तन का सबसे ठोस उदाहरण यहाँ की प्रमुख फसल—नारियल की खेती और उससे जुड़ी आजीविका में देखा जा सकता है। लक्षद्वीप की अधिकांश ग्रामीण अर्थव्यवस्था नारियल उत्पादन पर टिकी हुई है। पहले पारंपरिक किसानों को अपने उत्पादों के लिए उचित और प्रीमियम बाजार भाव नहीं मिल पाता था क्योंकि उनके पास प्रमाणन का अभाव था। जब पूरे केंद्रशासित प्रदेश को जैविक घोषित कर दिया गया, तब 'एक जिला-एक उत्पाद' योजना के तहत यहाँ के ऑर्गेनिक नारियल तेल और अन्य उत्पादों को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान मिली। किसानों को अब अपनी उपज का सीधा और बेहतर मूल्य मिलने लगा है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। यह मॉडल यह साबित करता है कि पारिस्थितिकी संरक्षण और आर्थिक समृद्धि एक-साथ चल सकते हैं।

What experts say about it

कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों का मानना है कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों से मुक्त खेती न केवल मिट्टी की सेहत के लिए वरदान है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य की रक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम भी है। जब कोई पूरा क्षेत्र जैविक खेती को अपनाता है, तो वहां की जैव विविधता में चमत्कारी सुधार देखने को मिलता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार की कृषि प्रणालियाँ भूजल स्तर को सुधारने, कार्बन सिंक बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

नीति आयोग और केंद्रीय कृषि मंत्रालय के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस केंद्र शासित प्रदेश का मॉडल पूरे देश के लिए एक प्रेरणा स्त्रोत है। यहाँ के किसानों ने यह साबित कर दिखाया है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का सही समन्वय करके बिना किसी रासायनिक इनपुट के भी बेहतरीन और उच्च गुणवत्ता वाली फसलें उगाई जा सकती हैं। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इस मॉडल को अपनाने से किसानों की आय में स्थिरता आती है क्योंकि उन्हें महंगे रासायनिक उत्पादों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता और जैविक उत्पादों की बाजार में कीमत भी बेहतर मिलती है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या पूरी तरह जैविक कृषि अपनाने से शुरुआती दौर में किसानों की पैदावार कम हो जाती है?

उत्तर: हाँ, संक्रमण काल (transition period) के दौरान लगभग 2 से 3 वर्षों के लिए मिट्टी को रासायनिक उर्वरकों से मुक्त होने में समय लगता है, जिससे शुरुआती कुछ फसलों में हल्की गिरावट आ सकती है। हालांकि, एक बार मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता वापस आ जाने के बाद, पैदावार स्थिर हो जाती है और लंबी अवधि में यह पारंपरिक खेती से अधिक लाभदायक साबित होती है।

प्रश्न 2: इस क्षेत्र में पारंपरिक रसायनों के आयात और उपयोग पर किस प्रकार का प्रतिबंध है?

उत्तर: इस केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन ने कानून और सख्त नीतियों के माध्यम से सिंथेटिक उर्वरकों, कीटनाशकों और वीडिसाइड्स के प्रवेश तथा बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगा रखी है। कृषि विभाग द्वारा नियमित रूप से गुणवत्ता की जांच की जाती है और केवल प्रमाणित जैविक आदानों (organic inputs) जैसे खाद, बायो-पेस्टिसाइड्स और वर्मीकंपोस्ट के उपयोग को ही बढ़ावा दिया जाता है।

End with a provocative open question to the reader

जब एक छोटा सा द्वीप क्षेत्र अपनी इच्छाशक्ति और नीतियों के दम पर पूरी तरह रसायन-मुक्त बन सकता है, तो क्या देश के बाकी महानगरों और बड़े राज्यों के उपभोक्ता अपनी सुविधा छोड़कर उस कीमत को चुकाने को तैयार हैं जो एक स्वस्थ भविष्य के लिए अनिवार्य है?