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साल 2008 की वह शुरुआत भला किसे भूली होगी, जब दुनिया भर के क्रिकेट पंडित इस बात को लेकर संशय में थे कि क्या कोई फ्रेंचाइजी आधारित टी20 लीग टिक पाएगी। उस शुरुआती दौर में खिलाड़ियों की नीलामी का फलसफा बिल्कुल अलग था। तब सैलरी कैप सीमित थी, और महेंद्र सिंह धोनी को जब चेन्नई सुपर किंग्स ने लगभग 6 करोड़ रुपये में खरीदा था, तो उसे दुनिया का सबसे महंगा सौदा मानकर अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर जगह दी गई थी। तब किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि आने वाले दशकों में यह टूर्नामेंट महज़ एक खेल नहीं बल्कि दुनिया की सबसे ताकतवर वित्तीय खेल महाशक्ति बन जाएगा।
वक्त पहिया घूमा, डिजिटल और टीवी प्रसारण के अधिकार अरबों डॉलर में बिके, और फ्रेंचाइजी की तिजोरियां नोटों से भर गईं। जैसे-जैसे कॉरपोरेट घरानों ने टीमों में अपनी दिलचस्पी बढ़ाई, वैसे-वैसे ऑक्शन का मिजाज भी बदलता गया। शुरुआती साधारण बोलियों से लेकर खिलाड़ियों को खरीदने के लिए होने वाली खूनी जंग तक का सफर बड़ा दिलचस्प रहा है। टीमों ने अब गणितीय एल्गोरिदम, डेटा एनालिटिक्स और आक्रामक रणनीतियों का सहारा लेना शुरू कर दिया है। इसी का परिणाम है कि आज एक अदद मैच जिताने वाले खिलाड़ी को अपने पाले में करने के लिए फ्रेंचाइजी अपनी आधी से ज्यादा पर्स वैल्यू एक झटके में लुटाने से गुरेज नहीं करतीं। यह केवल एक बोली नहीं, बल्कि उस रसूख और रणनीति की जंग है जो तय करती है कि कौन सी टीम मैदान पर राज करेगी।
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