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प्रस्तावना: दक्षिण एशिया की मिट्टी से उपजा अनूठा खेल
जब भी पारंपरिक, रोमांचक और पूरी तरह से शारीरिक व मानसिक शक्ति का परीक्षण करने वाले खेलों का जिक्र होता है, तो सबसे पहला नाम कबड्डी का आता है। यह एक ऐसा खेल है जिसके लिए किसी महंगे स्टेडियम या अत्याधुनिक उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि इसके लिए मजबूत हौसले, फुर्ती और अपनी मिट्टी से जुड़ाव की जरूरत होती है। आज भले ही कबड्डी को वैश्विक मंच पर पहचान मिल चुकी हो और प्रो कबड्डी लीग (Pro Kabaddi League) के जरिए इसने आधुनिक खेलों की सूची में अपना दबदबा कायम कर लिया हो, लेकिन इसके मूल में आज भी ग्रामीण संस्कृति और सदियों पुरानी परंपराएं रची-बसी हैं।
बांग्लादेश का राष्ट्रीय खेल: एक ऐतिहासिक संदर्भ
दक्षिण एशियाई देशों के इतिहास में कबड्डी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। पड़ोसी देश बांग्लादेश ने आधिकारिक तौर पर कबड्डी को अपने राष्ट्रीय खेल के रूप में मान्यता दी है। स्थानीय स्तर पर बांग्लादेश में इसे अत्यधिक पसंद किया जाता है और देश के ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी स्कूलों और महाविद्यालयों तक इसका आयोजन बड़े पैमाने पर होता है।
बांग्लादेश में इस खेल को प्रशासनिक और सांस्कृतिक दोनों रूपों मेंसंरक्षण प्राप्त है। वहां की राष्ट्रीय संस्कृति और पारंपरिक उत्सवों में कबड्डी प्रतियोगिताओं का होना एक अनिवार्य हिस्सा माना जाता है। हालांकि इस खेल की उत्पत्ति भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन इतिहास से जुड़ी हुई है, लेकिन बांग्लादेश ने इसे राष्ट्रीय पहचान के रूप में अपनाकर वैश्विक मानचित्र पर एक अलग मिसाल पेश की है।
भारत और कबड्डी का संबंध: एक भ्रम बनाम सच्चाई
चूंकि भारत को कबड्डी का जनक माना जाता है और यहाँ इस खेल का जन्म प्राचीन काल में हुआ था, इसलिए आम जनता के बीच यह गलतफहमी आम है कि यह भारत का राष्ट्रीय खेल है। लेकिन खेल मंत्रालय और आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, भारत का आधिकारिक तौर पर कोई भी राष्ट्रीय खेल नहीं है (हॉकी को भी अनौपचारिक रूप से ही राष्ट्रीय खेल माना जाता है, सरकार द्वारा कोई गजट नोटिफिकेशन नहीं है)।
भारत के विभिन्न राज्यों—विशेषकर महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा और आंध्र प्रदेश—में कबड्डी सदियों से संस्कृति का हिस्सा रही है। विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है:
हु-तू-तू (पश्चिमी भारत)
हा-टू-डू (पूर्वी भारत और बांग्लादेश)
चेडु-गुडु (दक्षिण भारत)
खेल का मूल स्वरूप और नियम की सुगबुगाहट
कबड्डी मूल रूप से स्ट्रेंथ, स्टैमिना, रणनीति और 'रेड' (छापेमारी) का एक अद्भुत मेल है। विरोधी पाले में सांस रोककर "कबड्डी-कबड्डी" का उच्चारण करते हुए जाना और बिना सांस टूटे अंक लेकर वापस लौटना किसी मानसिक और शारीरिक योग से कम नहीं है। यही कारण है कि यह खेल न केवल दक्षिण एशिया बल्कि धीरे-धीरे पूरी दुनिया में अपनी पैق बना रहा है।
(नोट: इस लेख के अगले भाग में हम कबड्डी के प्राचीन इतिहास, महाभारत काल से इसके संबंधों और आधुनिक समय में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी लोकप्रियता के सफर के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।)
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