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बिहार की धरती ने दुनिया को सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाया है, लेकिन जब बात शहरी स्वच्छता की आती है, तो तस्वीरें अक्सर विचलित करने वाली होती हैं। हालिया स्वच्छता सर्वेक्षण के आंकड़ों और जमीनी हकीकत को देखें तो सीवान और सासाराम जैसे शहर स्वच्छता के पायदान पर सबसे नीचे नजर आते हैं। हालांकि, सरकारी फाइलों में कभी पटना तो कभी गया की रैंकिंग गिरती-संभलती रहती है, लेकिन नागरिक सुविधाओं और कचरा प्रबंधन के अभाव में बिहार के कई नगर निकाय आज भी गंदगी के ढेर पर बैठे हैं।
स्वच्छता का पैमाना और बिहार की विडंबना
किसी भी शहर को 'गंदा' घोषित करना केवल एक टैग नहीं, बल्कि वहां की प्रशासनिक विफलता और नागरिक चेतना की कमी का आईना है। भारत सरकार के 'स्वच्छ सर्वेक्षण' में मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर ध्यान दिया जाता है: सर्विस लेवल प्रोग्रेस, सर्टिफिकेशन और सिटीजन फीडबैक। बिहार के संदर्भ में देखें तो गंगा किनारे बसे शहरों में जहां कुछ सुधार दिखा है, वहीं उत्तर बिहार के घनी आबादी वाले व्यापारिक केंद्र आज भी जलजमाव और खुले डंपिंग यार्ड की समस्या से जूझ रहे हैं।
समस्या की जड़ केवल सड़कों पर पड़ा कूड़ा नहीं है। असली चुनौती है ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) का न होना। बिहार के अधिकांश नगर निगमों के पास कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। सासाराम जैसे ऐतिहासिक शहर में, जहां शेरशाह सूरी का मकबरा पर्यटकों को आकर्षित करता है, वहां की सड़कों पर फैला कचरा और नालियों का उफनता पानी व्यवस्था की पोल खोल देता है। क्या यह सिर्फ संसाधनों की कमी है? शायद नहीं। यह एक गहरी ढांचागत समस्या है जहाँ बजट तो आवंटित होता है, लेकिन धरातल पर वह 'स्वच्छता' के बजाय 'भ्रष्टाचार' की भेंट चढ़ जाता है।
गंदगी के हॉटस्पॉट: सीवान से सासाराम तक का विश्लेषण
स्वच्छता सर्वेक्षण 2023 और उसके बाद के आंशिक आंकड़ों का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो सीवान की स्थिति काफी चिंताजनक रही है। इस शहर ने 'बॉटम' रैंकिंग में अपनी जगह बनाई, जिसने स्थानीय प्रशासन की नींद उड़ा दी। सीवान की समस्या इसकी बेतरतीब बसावट और संकरी गलियां हैं, जहां सफाई गाड़ियों का पहुंचना आज भी एक सपना है। यहाँ ड्रेनेज सिस्टम का फेल होना केवल मानसून की समस्या नहीं है, बल्कि यह सालों भर रहने वाली एक त्रासदी बन चुकी है।
वहीं दूसरी ओर, सासाराम की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। ऐतिहासिक गौरव और आधुनिक बदहाली का ऐसा संगम कम ही देखने को मिलता है। यहाँ के 'कचरा प्वाइंट्स' रिहायशी इलाकों के इतने करीब हैं कि बीमारियां घर-घर का हिस्सा बन चुकी हैं। जब हम इन शहरों को 'सबसे गंदा' कहते हैं, तो हमें यह भी देखना होगा कि यहाँ प्रति व्यक्ति कचरा उत्पादन और उसके उठाव के बीच का अंतराल कितना बड़ा है। अक्सर छोटे शहरों को बड़े शहरों की तुलना में कम संसाधन मिलते हैं, जिससे वे इस सफाई की दौड़ में पिछड़ जाते हैं। गया और भागलपुर जैसे शहरों ने धीरे-धीरे अपनी स्थिति सुधारी है, लेकिन सीवान जैसे शहर अभी भी उस शुरुआती संघर्ष से गुजर रहे हैं जहां बुनियादी कूड़ा उठाव भी एक चुनौती है।
जनसंख्या का दबाव और ड्रेनेज की जर्जर स्थिति
बिहार के शहरों की गंदगी का एक बड़ा कारण अनियंत्रित शहरीकरण है। जब शहर बिना किसी मास्टर प्लान के बढ़ते हैं, तो सबसे पहले स्वच्छता की बलि चढ़ती है। सड़कों का अतिक्रमण इतना अधिक है कि सफाई कर्मियों के लिए नियमित झाड़ू लगाना भी मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, बिहार की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहाँ की मिट्टी में जल सोखने की क्षमता कम है, और जब पुराने ड्रेनेज सिस्टम पर आबादी का बोझ बढ़ता है, तो पूरा शहर एक गंदे नाले में तब्दील हो जाता है।
व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो गंदगी का असर केवल दृश्यता तक सीमित नहीं है। यह सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य और आर्थिक उत्पादकता को प्रभावित कर रहा है। जिन शहरों की रैंकिंग गिरती है, वहां निवेश कतराता है और पर्यटन उद्योग दम तोड़ देता है। मुजफ्फरपुर जैसे व्यापारिक केंद्र में, जलजमाव और गंदगी के कारण हर साल कारोबार को करोड़ों का नुकसान होता है। लोग गंदगी को नियति मान चुके हैं, और यही सबसे बड़ा खतरा है। जब तक नागरिक 'मेरा शहर, मेरी जिम्मेदारी' के भाव को नहीं अपनाएंगे और प्रशासन अपनी जवाबदेही तय नहीं करेगा, तब तक रैंकिंग के पायदानों पर बिहार के शहरों का संघर्ष जारी रहेगा।
आम गलतियाँ और विशेषज्ञ सुझाव
अक्सर जब हम बिहार के सबसे गंदे शहर की बात करते हैं, तो सारा दोष नगर निगम या सरकार पर मढ़ देते हैं। यह एक सबसे बड़ी 'पिटफॉल' यानी गलती है। स्वच्छता केवल सरकारी तंत्र का काम नहीं, बल्कि एक नागरिक व्यवहार है। विशेषज्ञ मानते हैं कि वेस्ट सेग्रीगेशन (कचरा अलग करना) के प्रति जागरूकता की कमी सबसे बड़ी बाधा है। लोग आज भी गीला और सूखा कचरा एक ही डब्बे में डालते हैं, जिससे रीसाइक्लिंग की प्रक्रिया लगभग असंभव हो जाती है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि शहरों को 'स्वच्छता सर्वेक्षण' की रैंकिंग सुधारने के लिए 3R सिद्धांत (Reduce, Reuse, Recycle) को जमीनी स्तर पर लागू करना होगा। स्थानीय निकायों को कचरा डंपिंग साइट्स के वैज्ञानिक प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए। इसके अलावा, प्लास्टिक के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध और जल निकासी प्रणालियों (Drainage) का आधुनिकीकरण अनिवार्य है। नागरिकों के लिए सबसे बड़ा सुझाव यह है कि वे स्वच्छता को 'साप्ताहिक ईवेंट' के बजाय 'दैनिक आदत' बनाएँ। जब तक सार्वजनिक स्थानों पर थूकने और कचरा फेंकने की मानसिकता नहीं बदलेगी, रैंकिंग में बदलाव कठिन है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. बिहार का सबसे गंदा शहर किस आधार पर चुना जाता है?
भारत सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के तहत होने वाले 'स्वच्छता सर्वेक्षण' में कचरा संग्रहण, खुले में शौच से मुक्ति (ODF), कचरा मुक्त शहर की स्टार रेटिंग और नागरिक प्रतिक्रिया जैसे कड़े मानकों के आधार पर रैंकिंग तय की जाती है।
2. क्या पटना हमेशा से गंदे शहरों की सूची में रहा है?
नहीं, पिछले कुछ वर्षों में पटना की रैंकिंग में उतार-चढ़ाव देखा गया है। जलजमाव और बढ़ते शहरीकरण के दबाव के कारण कुछ सर्वेक्षणों में इसे निचले पायदान पर रखा गया था, लेकिन हालिया प्रयासों से स्थिति में सुधार हो रहा है।
3. स्वच्छता रैंकिंग सुधारने के लिए एक नागरिक क्या कर सकता है?
सबसे महत्वपूर्ण योगदान है कचरे का पृथक्करण। अपने घर से निकलने वाले कचरे को गीले और सूखे के रूप में अलग करें। साथ ही, 'स्वच्छता ऐप' के माध्यम से गंदगी की शिकायत दर्ज कराएं और सर्वेक्षण के दौरान अपना सही फीडबैक दें।
संपादकीय निर्णय (निष्कर्ष)
मेरी व्यक्तिगत राय में, किसी शहर को 'सबसे गंदा' का टैग देना उस शहर की क्षमता का अपमान नहीं, बल्कि एक वेक-अप कॉल है। बिहार के शहरों में ऐतिहासिक गौरव है, लेकिन आधुनिक स्वच्छता के मानकों पर हम पीछे छूट रहे हैं। समस्या संसाधनों की कमी से अधिक प्रबंधन और नागरिक अनुशासन की है। सहरसा, सीवान या पटना—कोई भी शहर तब तक स्वच्छ नहीं हो सकता जब तक वहां का समाज स्वच्छता को अपनी गरिमा से नहीं जोड़ता। सरकार बुनियादी ढांचा दे सकती है, लेकिन सफाई हमें ही रखनी होगी।
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