गीता के अनुसार जीवन क्या है?
गीता में जीवन की परिभाषा कर्म से जोड़कर दी गई है। यहाँ कर्म का अर्थ केवल काम करना नहीं, बल्कि निष्काम भाव से कर्तव्य का पालन करना है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि बिना कर्म के जीवन अधूरा है। यहाँ तक कि सन्यास लेने वाला व्यक्ति भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। असली सिद्धि, आत्म-साक्षात्कार, वहीं मिलती है जहाँ कर्म किया जाए, पर फल की इच्छा न रखी जाए।
एक महत्वपूर्ण श्लोक कहता है — “सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि” — यानी ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म करता है। इसका अर्थ है कि हम जैसे हैं, उसी के अनुसार हमारे कर्म भी होने चाहिए। अपनी प्रकृति, योग्यता और धर्म के अनुसार काम चुनना जीवन की सफलता की कुंजी है।
आजीविका के लिए काम चुनते समय भी यही सिद्धांत लागू होता है। अगर आप प्रकृति से शांत हैं, तो शांत कर्म में आपकी सिद्धि अधिक होगी। यदि आप सक्रिय और ऊर्जावान हैं, तो क्रियाशील कार्य ही आपके लिए उचित ह
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