बौद्ध धर्म का मूल मंत्र: शरण में जाने का सार
बौद्ध धर्म में कोई एकमात्र "मंत्र" नहीं है, लेकिन जीवन की दिशा देने वाला सबसे महत्वपूर्ण उद्घोष यह है: “बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि।”
इसका अर्थ है—“मैं बुद्ध की शरण में जाता/जाती हूँ, धर्म (शिक्षाओं) की शरण में जाता/जाती हूँ, और संघ (भिक्षु समुदाय) की शरण में जाता/जाती हूँ।” यह तीनों पंक्तियाँ बौद्ध आस्था की नींव हैं। इन्हें ‘त्रिशरण’ या ‘तीन शरणों’ के रूप में भी जाना जाता है।
गौतम बुद्ध ने जब ज्ञान प्राप्त किया, तो उन्होंने न किसी देवता की पूजा की, न किसी अनुष्ठान की आवश्यकता बताई। बल्कि, उन्होंने स्वयं को, अपने उपदेशों को और अनुयायी समुदाय को जीवन का सहारा बनने के लिए आमंत्रित किया। यही इस मंत्र की सार्थकता है—अहंकार छोड़कर सत्य, करुणा और सामूहिक बुद्धिमत्ता की ओर कदम बढ़ाना।
इस मंत्र का जाप बस साधना नहीं है, बल्कि एक प्रतिबद्धता है—सही जीव
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