सुदामा: कृष्ण के प्रिय मित्र और धर्म की परीक्षा
भगवान कृष्ण के अनेक भक्तों में सुदामा विशेष स्थान रखते हैं। वे केवल एक भक्त नहीं, बल्कि कृष्ण के बचपन के सखा भी थे। गुरुकुल में एक साथ पढ़ने के दिनों ने उनकी मित्रता को और गहरा कर दिया था। लेकिन जीवन के पथ अलग-अलग हो गए। जहाँ कृष्ण द्वारका के स्वामी बने, वहीं सुदामा गरीबी में जीवन बिताने लगे।
सवाल उठता है कि अगर सुदामा इतने प्रिय थे, तो उन्हें इतनी दुर्दशा क्यों झेलनी पड़ी? यह केवल भक्ति की परीक्षा नहीं, बल्कि धर्म की गहरी शिक्षा है। कृष्ण ने कभी सुदामा की आर्थिक स्थिति को तुरंत बदलने का चुनाव नहीं किया, क्योंकि वे जानते थे कि सच्ची भक्ति निस्वार्थ होती है।
जब सुदामा द्वारका गए, तो उनके पास चावल के कुछ मुट्ठी भर दाने ही उपहार थे। कृष्ण ने उस निर्धन उपहार को इतना महत्व दिया कि सुदामा के घर समृद्धि बरस गई। लेकिन यह समृद्धि तभी आई, जब सुदामा ने किसी अपेक्षा के बिना भक्ति की।
सुदामा की कथा हम
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