गांधी का सर्वोदय: सभी की प्रगति का सपना
गांधी जी के दर्शन में सर्वोदय एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इस शब्द का सीधा अर्थ है – 'सभी का उत्थान' या 'सार्वभौमिक प्रगति'। यह केवल कुछ लोगों के विकास की बात नहीं, बल्कि हर व्यक्ति, हर समुदाय के सर्वांगीण विकास की बात है। गांधी जी ने यह विचार जॉन रस्किन की पुस्तक अंटू दिस लास्ट से लिया, जिसमें काम करने वाले हर इंसान की गरिमा और समान अधिकार पर जोर दिया गया है।
सर्वोदय का लक्ष्य ऐसे समाज का निर्माण करना था जो वर्ग, जाति और शोषण से मुक्त हो। गांधी जी मानते थे कि असली प्रगति तभी होती है जब सबके पास खाने, पहनने, शिक्षा और काम के बराबर अवसर हों। उनके लिए समाज की प्रगति का मापदंड सिर्फ आर्थिक विकास नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक उन्नति भी थी।
इस दर्शन में छोटे कार्यों की भी बड़ी भूमिका है – जैसे गांवों में खादी का उत्पादन, स्वावलंबन और सहयोग। गांधी जी का विश्वास था कि अगर हर व्यक्ति अपने कर्तव्य को ईमा
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