बूढ़ा बिंदु क्या खोद रहा था?

जब धनी ने पूछा कि बूढ़ा बिंदु क्या खोद रहा था, तो बिंदा हँस पड़े। उन्होंने कहा, “हाँ, वह तो हैं ही।” यह उत्तर सीधा नहीं था, लेकिन इसमें एक गहरा अर्थ छिपा था। दोपहर का समय था, आश्रम में सन्नाटा छाया हुआ था। पक्षियों की चहचहाहट के बीच धनी अपने पिता को ढूँढ़ता हुआ आगे बढ़ा।

अंत में उसे एक पुराने पेड़ के नीचे उन्हें देखने को मिला। वे शांत भाव से चरखा कात रहे थे। उनके हाथ धीमे-धीमे चल रहे थे, मानो समय के साथ ताल बिठाकर जीवन की डोर को मोड़ रहे हों। चरखे की आवाज़ और हवा में लहराती पत्तियाँ मिलकर एक अद्भुत संगीत बना रही थीं।

लेकिन फिर, बूढ़ा बिंदु खोद क्या रहा था?

शायद वह ज़मीन नहीं, बल्कि अर्थ खोद रहा था। शायद एक ऐसी गहराई जो आँखों से नहीं दिखती। बिंदा की हँसी में वही सच छिपा था—कभी-कभी सवालों के जवाब क्रिया में होते हैं, शब्दों में नहीं। चरखा कातना, पेड़ की छाया में बैठना, शांति को गले लगान

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