गांधी की दृष्टि में आधुनिक सभ्यता
महात्मा गांधी के लिए सच्ची सभ्यता केवल तकनीकी प्रगति या भौतिक समृद्धि नहीं थी, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक विकास का संतुलन थी। उनके अनुसार, आज की आधुनिक सभ्यता अनीति और अधर्म पर आधारित है, जो धीरे-धीरे सब कुछ निगल रही है। यह सभ्यता उपभोग, हिंसा और लालच की नींव पर खड़ी है, जिससे समाज के मूल्य टूट रहे हैं।
गांधी ने वर्तमान सभ्यता की चार बड़ी समस्याओं पर चिंता जताई। पहली—हथियार और हिंसा का बढ़ता प्रयोग, जो मानवता के खिलाफ है। दूसरी—पर्यावरण का दोहन, जहां प्रकृति को सिर्फ संसाधन के रूप में देखा जाता है। तीसरी—निर्धनता, जो आज भी लाखों लोगों को जीवन के मूलभूत अधिकारों से वंचित कर रही है। और चौथी—मानवाधिकारों की अवहेलना, जहां व्यक्ति की गरिमा भौतिक लाभ के आगे झुक जाती है।
गांधी कहते थे कि सच्ची प्रगति तभी होगी जब समाज में सत्य, अहिंसा और स्वावलंबन की भावना बढ़ेगी। आज, जब हम तकनीकी चमत्कारों के बीच जी रहे हैं, उनकी यह चेतावनी और भी प्रासंगिक लगती है। क्या हमारी सभ्यता सच में सभ्य है, या बस तेजी से चलने वाली एक बेकाबू रेलगाड़ी?
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