तिलक: भारतीय संस्कृति का पावन प्रतीक
भारतीय संस्कृति में माथे पर लगाया जाने वाला चिन्ह तिलक कहलाता है। यह केवल एक सजावट नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शुद्धता और शुभ मान्यता का प्रतीक है। प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि तिलक लगाए बिना कोई भी शुभ कार्य, चाहे वह पूजा हो, यज्ञ हो या कोई धार्मिक अनुष्ठान, पूर्णतः फलदायी नहीं होता।
तिलक का स्थान हमेशा भौंहों के बीच, जहाँ तीसरी आँख मानी जाती है, वहीं होता है। इसे चंदन, कुमकुम, बिंदी, या गंगाजल से बने रंगों से लगाया जाता है। वैष्णव संप्रदाय में ऊर्ध्वपुंड्र, शैव संप्रदाय में भस्म की तीन रेखाएँ, और शाक्त संप्रदाय में कुमकुम का तिलक प्रचलित है।
शास्त्रों के अनुसार, तिलकहीन व्यक्ति का दर्शन भी अशुभ माना गया है। यह नियम न केवल पूजा-अनुष्ठान के समय, बल्कि समाज में एक आदर्श व्यक्ति के रूप में खड़े होने का भी संकेत देता है।
आज भी गाँवों से लेकर शहरों तक, त्योहारों, विवाह और धार्मिक सभाओं में
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