भगवान श्रीकृष्ण और शिकारी जरा की कथा

महाभारत की कथाओं में भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रसंग मिलते हैं, जिनमें से एक उनके इस लोक से विदा होने की घटना है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण की जीवन यात्रा का अंत एक बेहद ही अनोखी और भावुक घटना के साथ हुआ, जिसमें जरा नाम का एक शिकारी माध्यम बना।

कथा के अनुसार, महाभारत युद्ध की समाप्ति और यदुवंश के विनाश के बाद श्रीकृष्ण वन में एक वृक्ष के नीचे योग निद्रा में विश्राम कर रहे थे। उस समय उनका बायां पैर थोड़ा हिल रहा था। उसी वन में जरा नाम का एक शिकारी हिरण के शिकार की खोज में घूम रहा था। घने पत्तों के बीच से श्रीकृष्ण का पैर आंशिक रूप से दिखाई दे रहा था, जिसे शिकारी ने भूलवश किसी हिरण की आंख या उसका हिस्सा समझ लिया।

शिकारी ने बिना सोचे-समझे उसी दिशा में एक प्राणघातक तीर चला दिया। यह तीर सीधे श्रीकृष्ण के पैर के तलवे में जाकर लगा, जो उनके शरीर का एकमात्र संवेदनशील हिस्सा था। जब शिकारी अपने शिकार को देखने पास पहुंचा, तो भगवान को लहूलुहान पाकर वह आत्मग्लानी से भर गया और रोने लगा। हालांकि, श्रीकृष्ण ने उसे सांत्वना दी और बताया कि यह सब नियति का हिस्सा था। इस प्रकार, जरा नाम का वह शिकारी अनजाने में ही सही, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण के बैकुंठ प्रस्थान का निमित्त बन गया।

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