सीधा जवाब यह है कि पाकिस्तान पर भारत का कुल बकाया आज की तारीख में लगभग 300 करोड़ रुपये से अधिक है, जो विभाजन के समय के वित्तीय समझौतों से जुड़ा है। हालांकि, यह केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि सात दशकों से चली आ रही कूटनीतिक रस्साकशी का एक ज्वलंत उदाहरण है। जहाँ भारत इस कर्ज को ऐतिहासिक दायित्व मानता है, वहीं इस्लामाबाद इसे ठंडे बस्ते में डाल चुका है। यह बकाया राशि समय के साथ बढ़ते ब्याज और मुद्रास्फीति के कारण आज एक विशाल मनोवैज्ञानिक बोझ बन चुकी है।

विभाजन की राख से निकला वित्तीय बोझ: एक ऐतिहासिक संदर्भ

अगस्त 1947 में जब ब्रिटिश राज ने उपमहाद्वीप को दो हिस्सों में काटा, तो केवल जमीन नहीं बंटी, बल्कि खजाना, कर्ज और संपत्तियाँ भी बांटनी पड़ीं। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के तहत यह तय हुआ कि अविभाजित भारत की कुल देनदारियों का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान वहन करेगा। उस समय, नकदी के रूप में भारत ने पाकिस्तान को अपनी तिजोरी से 75 करोड़ रुपये देने का वादा किया था। भारत ने 20 करोड़ रुपये की पहली किस्त तुरंत जारी कर दी थी। लेकिन, कश्मीर पर कबाली हमले के बाद सरदार पटेल ने शेष 55 करोड़ रुपये रोकने का साहसिक निर्णय लिया था, जिसे बाद में गांधीजी के दबाव में जारी किया गया।

असली पेंच यहाँ फंसा कि विभाजन के समय जो सार्वजनिक ऋण (Public Debt) था, उसकी अदायगी की जिम्मेदारी भारत ने ली थी। तय यह हुआ कि पाकिस्तान भारत को अपनी हिस्सेदारी का भुगतान किस्तों में करेगा। 1947-48 के बजट दस्तावेजों और उसके बाद की ऑडिट रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान को 'विभाजन ऋण' के रूप में भारत

सावधानियां और विशेषज्ञ सुझाव