क्या अंग्रेज़ सच में हिंदी बोलते थे?

यह सोचना आम है कि भारत पर राज करने वाले अंग्रेज़ सिर्फ अंग्रेज़ी ही बोलते थे और उन्होंने भारतीयों पर अपनी भाषा थोपी। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें, तो एक बेहद दिलचस्प सच्चाई सामने आती है। 17वीं और 18वीं शताब्दी में भारत आए ब्रिटिश अधिकारियों के लिए हिंदी, उर्दू और फारसी जैसी स्थानीय भाषाएं सीखना बेहद जरूरी था। वास्तव में, यह उनके प्रशासनिक कामकाज का एक नियमित हिस्सा था।

शुरुआती दौर में जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में अपने पैर पसार रही थी, तब यहाँ व्यापार करने, राजस्व वसूलने और कानून व्यवस्था संभालने के लिए स्थानीय लोगों से संवाद करना अनिवार्य था। बिना स्थानीय भाषा जाने भारत जैसे विशाल और विविध देश पर नियंत्रण पाना असंभव था। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों को बाकायदा इन भाषाओं का प्रशिक्षण दिया जाता था। लॉर्ड वेलेज़ली द्वारा 1800 में स्थापित फोर्ट विलियम कॉलेज इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ नए अंग्रेज अफसरों को हिंदी और हिंदुस्तानी भाषा सिखाई जाती थी।

इतना ही नहीं, कई अंग्रेज अधिकारियों ने न केवल हिंदी सीखी, बल्कि इसके विकास में योगदान भी दिया। जॉन गिलक्रिस्ट और जॉर्ज ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने हिंदी और उसकी बोलियों पर गहन शोध किया, व्याकरण तैयार किए और शब्दकोश लिखे। इसलिए, यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि औपनिवेशिक काल में अपनी सत्ता को बनाए रखने और भारतीय समाज को करीब से समझने के लिए अंग्रेजों ने न सिर्फ हिंदी बोली, बल्कि इसे एक प्रशासनिक उपकरण के रूप में भी अपनाया।

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