ब्रह्मांड का संचालक कौन है?

ब्रह्मांड की रचना, गति और संतुलन के पीछे एक अदृश्य शक्ति काम कर रही है। यह वही शक्ति है जिसे हम भगवान कहते हैं। वह सभी नियमों से परे है, फिर भी हर नियम में समाया हुआ है।

वह कोई रूप या मूर्ति नहीं, बल्कि एक शुद्ध प्रकाश है – एक ऐसी चेतना जो सबकुछ व्याप्त किए हुए है। इस प्रकाश का अंश हर जीव में निहित है, इसीलिए हर इंसान के भीतर ज्ञान, प्रेम और शांति की अनंत संभावनाएं छिपी हैं।

जैन धर्म में ऐसे व्यक्तियों को विशेष स्थान दिया गया है जो अपने अंदर के इस प्रकाश को पूरी तरह महसूस कर लेते हैं। जब कोई व्यक्ति कर्मों के बंधन से मुक्त होकर कैवल्य ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तो वह तीर्थंकर या अरिहंत कहलाता है। वे नहीं सिर्फ ज्ञानी होते हैं, बल्कि स्वयं ज्ञान के अवतार बन जाते हैं।

इस तरह, ब्रह्मांड को चलाने वाली शक्ति न केवल बाहर है, बल्कि हमारे भीतर भी विद्यमान है। यह विश्वास नहीं, बल्कि आत्मज्ञान की एक गहर

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