भारत के सबसे बड़े कॉर्पोरेट कर्जदार और अर्थव्यवस्था पर उनका प्रभाव

ग्लोबल कंसल्टेंसी फर्म क्रेडिट सुईस (Credit Suisse) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के शीर्ष 10 कॉर्पोरेट समूहों पर लगभग 7.33 लाख करोड़ रुपये का भारी कर्ज दर्ज किया गया है। यह आंकड़ा देश के औद्योगिक क्षेत्र में कर्ज के बढ़ते स्तर और वित्तीय संतुलन की स्थिति को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।

भारत में बुनियादी ढांचे, बिजली, इस्पात और दूरसंचार जैसे बड़े क्षेत्रों में व्यापार विस्तार के लिए कंपनियां अक्सर भारी मात्रा में बैंक ऋण लेती हैं। अत्यधिक कर्ज लेने से कंपनियां तेजी से प्रगति तो कर सकती हैं, लेकिन बाजार में मंदी या प्रोजेक्ट में देरी होने पर कर्ज भुगतान का संकट खड़ा हो जाता है। इसका सीधा नकारात्मक असर देश के बैंकिंग क्षेत्र पर पड़ता है और गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) का जोखिम बढ़ जाता है।

हालांकि, हाल के वर्षों में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और सरकार की सख्त नीतियों के कारण कंपनियों ने 'डी-लेवरेजिंग' यानी कर्ज कम करने की प्रक्रिया पर ध्यान दिया है। कई बड़े उद्योग समूहों ने अपनी गैर-ज़रूरी संपत्तियों को बेचकर अपने बैलेंस शीट को मजबूत करने और कर्ज का बोझ घटाने की दिशा में बड़े कदम उठाए हैं।

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