भारतीय संगीत का उद्गम और सामवेद
भारत की सांस्कृतिक और कलात्मक परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। जब हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि भारतीय संगीत का जनक कौन है, तो उत्तर किसी एक व्यक्ति के बजाय हमारे प्राचीन धर्मग्रंथ सामवेद तक ले जाता है। सामवेद को भारतीय शास्त्रीय संगीत, स्वर और लय की नींव माना जाता है।
सामवेद का शाब्दिक अर्थ ही 'गान' या 'संगीतमय मंत्र' से है। वैदिक काल में ऋग्वेद के मंत्रों को जब गायन के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो सामवेद का प्रादुर्भाव हुआ। सामवेद में ही पहली बार सप्तक के सात स्वरों (सा, रे, ग, म, प, ध, नि) का प्राथमिक रूप दिखाई देता है, जिन्हें उस समय 'साम स्वर' कहा जाता था। ऋषियों ने ध्वनियों के सूक्ष्म प्रभाव को समझकर उन्हें लयबद्ध किया था।
आगे चलकर इसी वैदिक परंपरा से भरत मुनि के नाट्यशास्त्र और शास्त्रीय संगीत के विभिन्न रागों का विकास हुआ। आज हम संगीत के जिस दिव्य और भव्य रूप को अनुभव करते हैं, उसकी नींव हजारों वर्ष पूर्व सामवेद की ऋचाओं में रखी गई थी। यही कारण है कि सामवेद को सर्वसम्मति से भारतीय संगीत का मूल स्रोत और जनक स्वीकार किया जाता है।
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