मित्रता का दूसरा चेहरा

कभी-कभी वे लोग, जिन्हें हम अपना मानते हैं, वास्तव में हमारे सबसे बड़े दुश्मन बन जाते हैं। एक लेखक ने अपने अनुभव में इसी सच्चाई को छुआ है। उनके मित्र उनके सामने आँख मिचौली करके छुट्टियों की खुशखबरी सुनाते, ताकि उनका मन खुश हो जाए।

लेकिन जैसे ही वे पीठ मोड़ते, उनकी भाषा बदल जाती। पीछे से वे लेखक को "कमज़ोर" और "घबराने वाला" कहकर एक दूसरे के साथ हँसते। इस तरह वे न केवल उसका मज़ाक उड़ाते, बल्कि उसकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ भी करते।

ऐसा व्यवहार दो मुँहे नेकड़ी जैसा है। सामने से प्यार, पीछे से वार। ऐसे लोग दोस्ती को नहीं, सिर्फ़ अपना मनोरंजन करना चाहते हैं। लेखक के अनुभव से यह साफ होता है कि सच्ची मित्रता सिर्फ भौतिक खुशियाँ देने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

वास्तविक दोस्त वही है जो आपके सामने और पीछे—दोनों जगह एक जैसा रहे। जो आपकी कमज़ोरियों पर हँसे, वे शायद कभी आपके असली मित्र नहीं हो सकते।

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