भारतीय संगीत में 'सम' का महत्व: जहाँ से शुरू होती है ताल की यात्रा
भारतीय शास्त्रीय संगीत में ताल केवल एक गिनती नहीं है, बल्कि यह गायन और वादन की आत्मा है। संगीत में ताल को सही ढंग से समझने के लिए ताली और खाली जैसे हाथ के इशारों का प्रयोग किया जाता है। जब कोई कलाकार तबला या ढोलक बजाता है, तो इन्हीं इशारों के ज़रिए ताल के अलग-अलग खंडों (विभागों) को दर्शाया जाता है।
इसी व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होता है 'सम'। किसी भी ताल के पहले खंड (विभाग) की पहली मात्रा पर जो मुख्य ताली पड़ती है, उसे ही संगीत की भाषा में 'सम' कहा जाता है। इसे अक्सर ताल चक्र का शुरुआती और सबसे पहला पड़ाव माना जाता है।
संगीत की दुनिया में 'सम' की भूमिका बहुत खास है:
ताल की शुरुआत और अंत: गायक या वादक अपनी बंदिश और लयकारी में कितना भी घूम लें, उन्हें अंततः 'सम' पर आकर ही मिलना होता है। यह बिंदु संगीत में एक सुंदर ठहराव और पूर्णता लाता है।
मुख्य पहचान: इसे दर्शाने के लिए हाथ से पहली और सबसे प्रमुख ताली बजाई जाती है। लिखित संगीत में इसे अक्सर 'X' के चिह्न से दिखाया जाता है।
संक्षेप में कहें तो, सम भारतीय ताल व्यवस्था का वह केंद्र बिंदु है, जहाँ से संगीत की यात्रा शुरू होती है और वहीं आकर एक खूबसूरत मोड़ पर समाप्त होती है।
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