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सन् 1991 में जब सोवियत संघ ताश के पत्तों की तरह बिखरा, तब किसी ने नहीं सोचा था कि आधी सदी पुरानी दुश्मनी एक नए और अधिक खतरनाक रूप में वापस लौटेगी। आज जब हम यह सवाल करते हैं कि रूस का सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी या दुश्मन देश कौन सा है, तो सीधा और स्पष्ट जवाब है—संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)। हालांकि, वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि पूरा नाटो (NATO) गठबंधन और विशेष रूप से यूक्रेन, रूस के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। यह दुश्मनी केवल सीमाओं की जंग नहीं, बल्कि वर्चस्व की वैश्विक लड़ाई है।
शीतयुद्ध की विरासत और इस ऐतिहासिक दुश्मनी की गहरी जड़ें
रूस और पश्चिमी देशों के बीच कड़वाहट रातों-रात पैदा नहीं हुई। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से ही दुनिया दो ध्रुवों में बंट गई थी। एक तरफ पूंजीवादी अमेरिका था और दूसरी तरफ साम्यवाद का झंडा बुलंद करता सोवियत संघ (USSR)। वैचारिक मतभेदों ने एक ऐसे छद्म युद्ध (Proxy War) को जन्म दिया, जिसने दशकों तक पूरी दुनिया को परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ा रखा। जब सोवियत संघ का पतन हुआ, तो रूस को उम्मीद थी कि पश्चिमी देश उसे एक समान भागीदार के रूप में स्वीकार करेंगे। बोरिस येल्तसिन के दौर में रूस ने पश्चिम की ओर हाथ भी बढ़ाया। लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगियों ने रूस को एक पराजित महाशक्ति की तरह देखना शुरू कर दिया। नाटो ने वादे के खिलाफ जाकर पूर्व की ओर अपना विस्तार जारी रखा, जिसने रूस के भीतर असुरक्षा की भावना को चरम पर पहुंचा दिया। व्लादिमीर पुतिन के सत्ता में आने के बाद, रूस ने अपनी खोई हुई संप्रभुता और सम्मान को वापस पाने के लिए एक आक्रामक रुख अपनाया, जिसने पुरानी दुश्मनी की आग में घी डालने का काम किया।
तनाव की क्रोनोलॉजी: कैसे एक के बाद एक घटित हुईं ऐतिहासिक घटनाएं
इस दुश्मनी के वर्तमान स्वरूप तक पहुंचने की प्रक्रिया बेहद सुनियोजित और चरणबद्ध रही है। इसे हम निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझ सकते हैं:
पहला चरण: नाटो का पूर्वी विस्तार और रूसी आपत्ति। शीतयुद्ध के खात्मे के वक्त पश्चिमी देशों ने अनौपचारिक रूप से आश्वासन दिया था कि नाटो एक इंच भी पूर्व की तरफ नहीं बढ़ेगा। लेकिन पोलैंड, हंगरी और चेक गणराज्य जैसे पूर्व सोवियत प्रभाव वाले देशों को नाटो में शामिल करके पश्चिम ने रूस की घेराबंदी शुरू कर दी।
दूसरा चरण: 2008 का बुखारेस्ट शिखर सम्मेलन। यह वह मोड़ था जहां दुश्मनी की रूपरेखा तय हुई। नाटो ने घोषणा की कि जॉर्जिया और यूक्रेन भविष्य में इस सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनेंगे। रूस के लिए यह एक 'रेड लाइन' थी, क्योंकि यूक्रेन को वह अपनी सुरक्षा के लिए एक बफर जोन मानता है।
तीसरा चरण: 2014 का क्रीमिया संकट। जब यूक्रेन में पश्चिम समर्थक सरकार सत्ता में आई, तो रूस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्रीमिया प्रायद्वीप को अपने नियंत्रण में ले लिया। इसके बाद अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए, जिससे बातचीत के सारे रास्ते बंद हो गए।
चौथा चरण: 2022 का पूर्ण सैन्य आक्रमण। तनाव जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया, तब रूस ने यूक्रेन के खिलाफ 'विशेष सैन्य अभियान' शुरू कर दिया। इसके बाद अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों ने रूस को वैश्विक वित्तीय प्रणाली (SWIFT) से बाहर कर दिया और यूक्रेन को हथियारों की असीमित आपूर्ति शुरू कर दी, जिससे यह युद्ध सीधे तौर पर रूस बनाम नाटो में बदल गया।
यूक्रेन युद्ध: आधुनिक दौर में इस दुश्मनी का सबसे जीवंत और घातक उदाहरण
इस दुश्मनी का सबसे प्रत्यक्ष और भयानक रूप हमें फरवरी 2022 से जारी यूक्रेन संघर्ष में देखने को मिलता है। यूक्रेन खुद को संप्रभु राष्ट्र के रूप में पश्चिमी लोकतंत्र और नाटो की छत्रछाया में देखना चाहता है, जबकि रूस इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा मानता है। अमेरिका ने इस युद्ध में यूक्रेन को पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम, अब्राम्स टैंक और अरबों डॉलर की वित्तीय सहायता प्रदान की है। रूस इसे अपने खिलाफ अमेरिका का छद्म युद्ध मानता है। इस संघर्ष ने साबित कर दिया है कि रूस और अमेरिका के बीच की खाई अब इतनी गहरी हो चुकी है, जिसे पाटना फिलहाल असंभव है। आर्थिक मोर्चे पर रूस पर लगाए गए हजारों प्रतिबंधों और राजनयिक स्तर पर उसे अलग-थलग करने की कोशिशों ने इस दुश्मनी को शीतयुद्ध से भी अधिक खतरनाक स्तर पर पहुंचा दिया है, जहां दोनों परमाणु शक्तियां सीधे टकराव के बेहद करीब खड़ी हैं।
विशेषज्ञों की राय (What Experts Say)
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में रूस के दुश्मनों की सूची किसी एक देश तक सीमित नहीं है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, नाटो (NATO) और अमेरिकी नेतृत्व वाला पश्चिमी गठबंधन रूस के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक खतरा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन संकट के बाद से रूस और पश्चिमी देशों के बीच 'नया शीत युद्ध' (New Cold War) शुरू हो चुका है। कुछ विचारकों का यह भी तर्क है कि रूस की दुश्मनी केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक वर्चस्व और विचारधारा की लड़ाई है। जहां एक तरफ पश्चिमी देश लोकतांत्रिक मूल्यों और मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं, वहीं रूस एक बहु-ध्रुवीय दुनिया (Multipolar World) की वकालत करता है, जिससे टकराव होना स्वाभाविक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: क्या अमेरिका और रूस हमेशा से एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन रहे हैं?
उत्तर: नहीं, ऐसा नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ (रूस) ने नाजियों के खिलाफ एक साथ मिलकर लड़ाई लड़ी थी। हालांकि, युद्ध समाप्त होने के बाद दोनों महाशक्तियों के बीच वैचारिक मतभेद गहरे हो गए, जिसने 'शीत युद्ध' का रूप ले लिया। सोवियत संघ के विघटन के बाद 1990 के दशक में दोनों देशों के रिश्तों में कुछ सुधार जरूर देखा गया था, लेकिन हालिया वर्षों में यूक्रेन विवाद, साइबर हमलों के आरोपों और नाटो के विस्तार के कारण दोनों देशों के बीच कड़वाहट अपने चरम पर पहुंच गई है।
प्रश्न 2: रूस और पश्चिमी देशों के बीच मौजूदा तनाव का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर: इस तनाव की मुख्य जड़ नाटो (NATO) का पूर्व की ओर विस्तार और यूक्रेन का पश्चिमी देशों की तरफ झुकाव है। रूस का मानना है कि उसकी सीमाओं के पास नाटो की मौजूदगी उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक सीधा और गंभीर खतरा है। इसके अलावा, आर्थिक प्रतिबंध, भू-राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने की होड़ और सीरिया व पूर्वी यूरोप जैसे क्षेत्रों में दोनों पक्षों के विरोधाभासी हित इस दुश्मनी और अविश्वास को लगातार हवा दे रहे हैं।
एक विचारणीय प्रश्न
बदलते वैश्विक समीकरणों, नई सैन्य तकनीकों और आर्थिक प्रतिबंधों के इस दौर में, क्या रूस और पश्चिमी देशों के बीच की यह गहरी खाई कभी पट पाएगी, या फिर हम अनजाने में एक ऐसे वैश्विक संघर्ष की ओर बढ़ रहे हैं जिसका अंजाम पूरी मानवता को भुगतना पड़ सकता है?
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