बालकृष्ण के पैर का अंगूठा पीना: एक गहरा भाव
हर बालक की तरह बालकृष्ण भी मासूमियत में अपने पैर का अंगूठा चूसते थे। लेकिन संतों की दृष्टि में यह मुद्रा केवल बचपन की आदत नहीं, बल्कि गहरे दिव्य भाव की प्रतीक है।
क्यों पीते थे कृष्ण अपने पैर का अंगूठा?एक प्रसंग के अनुसार, बालकृष्ण अपने पैर को देखकर सोचते हैं कि "यह चरण ऐसा क्या विशेष है कि ब्रह्मा, शिव, देवता, ऋषि-मुनि इनकी वंदना करते हैं? इन्हीं पैरों के ध्यान मात्र से महापाप भी नष्ट हो जाते हैं?" इस निर्मल जिज्ञासा में वह अपने पैर के अंगूठे को मुंह में ले लेते हैं।
इस लीला में न तो अहंकार है, न दर्प। बल्कि वह अपने ही चरणों की महिमा को समझने की एक निर्मल लीला है। यह दृश्य भक्तों के लिए इतना प्रिय है कि आज भी भक्त इस मुद्रा को देखकर मुग्ध हो जाते हैं।
कृष्ण का यह स्वरूप — नन्हे बालक, गोपीजनों का आनंद, और ब्रह्मांड के स्वामी — सब कुछ एक साथ दिखाता है। और शायद इसीलिए वे अपने ही च
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