जीवन का अंतिम सत्य

इटारसी में एक प्राचीन सत्य की चर्चा आज भी गूंजती है—जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है। जो जन्म लेता है, उसे एक दिन निश्चित रूप से जाना है। यह नियम न तो किसी धनी के लिए टूटा है, न किसी राजा-महाराजा के लिए, और न ही किसी संत के लिए।

कोई भी धर्मात्मा हो या पुण्यात्मा, जिसने भी जीवन का द्वार खोला है, उसे उसके अंतिम द्वार—मृत्यु—के सामने झुकना ही पड़ेगा। यह भयानक नहीं, बल्कि प्राकृतिक है। जैसे दिन के बाद रात आती है, वैसे ही जन्म के बाद मृत्यु अपरिहार्य है।

लेकिन यहाँ एक और सच भी है—मनुष्य के कर्म उसे मृत्यु के बाद भी जीवित रखते हैं। कोई इतना ऊंचा कार्य कर जाता है कि उसका नाम समय के साथ भी जीवित रहता है। गांधीजी, रविंद्रनाथ टैगोर, भगवान बुद्ध—इनकी देह तो चली गई, लेकिन उनके कर्म आज भी हमारे बीच जीवित हैं।

इसलिए, जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु है, लेकिन उससे भी बड़ा सत्य है—अच्छे कर्म। क्यो

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