पश्चाताप और प्रायश्चित में अंतर
जीवन में हर कोई कभी न कभी कुछ ऐसा कर बैठता है, जिसके लिए बाद में उसे दुख होता है। यह दुख ही पश्चाताप है। जब कोई व्यक्ति अपने किए हुए काम पर खेद महसूस करता है, जब उसके मन में यह भावना जागती है कि "मैंने ऐसा नहीं करना चाहिए था", तो वह पश्चाताप कहलाता है। यह एक भावनात्मक प्रतिक्रिया है, जो अंदर से आती है।
लेकिन जब यह पश्चाताप सिर्फ भावना तक सीमित न रहकर कुछ करने की ओर बढ़ता है, तो वह प्रायश्चित बन जाता है। प्रायश्चित वह कार्य है जो किसी गलती की भरपाई करने के लिए किया जाता है। जैसे, अगर किसी ने किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है, तो माफ़ी माँगना, उसकी सहायता करना या कोई अच्छा काम करना — ये सब प्रायश्चित के रूप हैं।
सरल शब्दों में, पश्चाताप दिल की बात है, और प्रायश्चित उस बात को व्यवहार में बदलने का तरीका। पहला अंदर की ओर मुड़ना है, दूसरा बाहर की ओर कदम बढ़ाना। जब तक पश्चाताप कर्म नहीं बनता, तब तक वह अधू
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