बिहार में जातियों का सामाजिक समीकरण

बिहार की राजनीति और सामाजिक बनावट में जातियों की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। अगर राज्य की जनसांख्यिकी पर नजर डालें, तो यहाँ पिछड़ा वर्ग (OBC) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) मिलकर आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा बनाते हैं। यही वजह है कि राज्य के सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने में इन समुदायों का प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है।

आंकड़ों के अनुसार, बिहार में जनसंख्या के लिहाज से सबसे बड़ी जाति यादव समुदाय की है। राज्य की कुल आबादी में यादवों की हिस्सेदारी लगभग 16% है, जो इन्हें किसी भी एक जाति के मुकाबले सबसे बड़ा समूह बनाती है। इनके अलावा, पिछड़े वर्ग की अन्य प्रमुख जातियों में कुशवाहा (कोईरी, कच्छी, मुराव) की आबादी करीब 8 से 9 प्रतिशत के बीच है, जो खेती-किसानी और व्यापार से गहराई से जुड़े हैं। वहीं, कुर्मी समुदाय लगभग 4 प्रतिशत और धानुक समाज करीब 3.5 प्रतिशत की आबादी के साथ राज्य में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराता है।

इन प्रमुख जातियों के अलावा बिहार में कई अन्य छोटी-बड़ी उपजातियां भी हैं, जो मिलकर सूबे की विविधता को पूरा करती हैं। सदियों से ये सभी समुदाय बिहार की संस्कृति, लोक जीवन और यहाँ के विकास में अपनी-अपनी भूमिका निभाते आ रहे हैं।

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