संगीत और उसमें 'सम' का महत्व
भारतीय शास्त्रीय संगीत में संगीत शब्द का अर्थ केवल गाना गाना भर नहीं है, बल्कि इसे एक बेहद उत्कृष्ट और औचित्यपूर्ण कला माना गया है। 'संगीत' शब्द मूल रूप से 'गीत' शब्द में 'सम्' उपसर्ग जोड़कर बना है। यहाँ 'सम्' का सीधा अर्थ है 'सहित' या 'उत्कृष्टता के साथ', जबकि 'गीत' का अर्थ है 'गायन'। इस प्रकार, नियमबद्ध, मधुर और पूर्णता के साथ गाए जाने वाले गान को ही वास्तव में संगीत कहा जाता है।
संगीत और ताल की दुनिया में 'सम' का एक बेहद विशेष और महत्वपूर्ण स्थान है। ताल चक्र की सबसे पहली और मुख्य मात्रा को 'सम' कहा जाता है। किसी भी बंदिश, लय या तालबद्ध रचना की शुरुआत और समापन इसी बिंदु पर होता है। संगीतकार जब पूरी ताल में घूमकर वापस 'सम' पर आता है, तो वह क्षण गायन और वादन का सबसे आनंददायक बिंदु माना जाता है।
अतः संगीत में 'सम' केवल एक मात्रा नहीं है, बल्कि यह समानता, संगति, निरन्तरता और संतुलन का प्रतीक है, जो पूरे शास्त्रीय गायन और वादन को एक धागे में पिरोकर रखता है।
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