इस्लाम में ईश्वर यानी अल्लाह की कोई तस्वीर, मूर्ति या शारीरिक चित्रण (Representation) न होने के पीछे गहरा धार्मिक, दार्शनिक और अक़ीदे (आस्था) से जुड़ा कारण है। इस्लामी परंपरा में अल्लाह की निराकार (Formless) और असीम सत्ता को बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।
अल्लाह का कोई चित्र या फ़ोटो न होने के मुख्य कारणों का विस्तृत विश्लेषण नीचे दिया गया है:
1. तौहीद और ईश्वर का निराकार रूप इस्लाम का सबसे बुनियादी और प्राथमिक सिद्धांत तौहीद (एकेश्वरवाद) है। इसका अर्थ है कि अल्लाह एक है, वह अद्वितीय है और उसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती। कुरआन की सूरह अल-इखलास (112:4) में कहा गया है:
"और न कोई उसका समकक्ष (बराबर) है।"
मानव मन केवल उन्हीं चीज़ों की कल्पना या चित्रण कर सकता है, जिन्हें उसने देखा है या जो भौतिक सीमा (Physical Dimensions) में मौजूद हैं। चूंकि अल्लाह भौतिक सीमाओं, काल (Time) और स्थान (Space) से परे है, इसलिए उसकी कोई भी तस्वीर बनाना उसकी अनंत और सर्वव्यापी सत्ता को एक सीमित ढांचे में बांधने जैसा होगा, जो तौहीद के विचार के विरुद्ध है।
2. शिर्क (मूर्तिपूजा या समरूपता) से बचाव इस्लाम में शिर्क (अल्लाह के साथ किसी और को शरीक करना या उसकी तुलना किसी दृश्य वस्तु से करना) को सबसे बड़ा पाप माना गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो कई प्राचीन सभ्यताओं में ईश्वर के प्रतीकों या चित्रों की पूजा धीरे-धीरे मूर्तियों की पूजा में बदल गई।
चित्र या मूर्ति बनाने से लोग ईश्वर की अमूर्त (Abstract) भावना को छोड़कर उस भौतिक चित्र से भावनात्मक रूप से जुड़ने लगते हैं।
इस बात को रोकने के लिए इस्लामी शिक्षाओं में अल्लाह ही नहीं, बल्कि पैगंबरों (जैसे हज़रत मोहम्मद) के भी चित्र बनाने पर सख्त मनाही (Aniconism) लागू की गई ताकि लोग व्यक्ति-पूजा या चित्र-पूजा की ओर न भटकें।
3. कुरआन और हदीस के स्पष्ट निर्देश इस्लामी ग्रंथों में अल्लाह की असीमित सत्ता का वर्णन तो मिलता है, लेकिन उसके किसी शारीरिक आकार का खंडन किया गया है। सूरह अश-शूरा (42:11) में स्पष्ट रूप से उल्लेख है:
"उसके जैसी कोई चीज़ (वस्तु) नहीं है, और वह सब कुछ सुनने वाला और देखने वाला है।"
जब कोई चीज़ संसार की किसी भी वस्तु के समान है ही नहीं, तो चित्रकार किस आधार पर उसका चित्र बना सकता है? हदीसों (पैगंबर मोहम्मद के कथनों) में भी किसी भी पूजनीय सत्ता का चित्र या रूप तराशने से बचने की ताकीद की गई है।
4. मानवीय कल्पना की सीमाएं इस्लामी दर्शन (Islamic Philosophy) के अनुसार, इंसानी आंखें और दिमाग बहुत सीमित हैं। हम केवल तीन आयामों (Three Dimensions) और भौतिक नियमों के तहत सोचते हैं। अल्लाह इस पूरी सृष्टि का रचयिता (Creator) है, इसलिए रचयिता को उसकी बनाई गई रचना (Creation) के किसी आकार में ढालना तर्कसंगत नहीं है।
यदि कोई कलाकार अल्लाह का चित्र बनाने का प्रयास करता है, तो वह केवल अपनी सीमित मानवीय कल्पना को कैनवास पर उकेरेगा, जो वास्तविक ईश्वर की सत्ता का सरासर गलत प्रतिनिधित्व होगा।
(यह इस लेख का पहला भाग है, जिसमें मुख्य धार्मिक और दार्शनिक कारणों को स्पष्ट किया गया है।)
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