विषय-सूची
चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, यह सच है, लेकिन क्या यह एक विकसित देश है? बिल्कुल नहीं। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की फाइलों में चीन आज भी एक 'ऊपर-मध्यम आय' वाला विकासशील देश ही गिना जाता है। बीजिंग के चमचमाते आसमान और शंघाई की बुलेट ट्रेनों के पीछे एक कड़वा सच छिपा है—प्रति व्यक्ति आय का भारी अभाव और असमान वितरण। चीन ने गरीबी तो मिटाई, लेकिन अपने नागरिकों को वह जीवन स्तर नहीं दे पाया जो नॉर्वे या अमेरिका में सामान्य माना जाता है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: डेंग शियाओपिंग की विरासत और अधूरा सफर
1978 के 'ओपन डोर' सुधारों के बाद चीन ने जो छलांग लगाई, वह मानव इतिहास में बेमिसाल है। साम्यवादी ढांचे के भीतर पूंजीवाद का जो तड़का डेंग शियाओपिंग ने लगाया, उसने चीन को 'दुनिया की फैक्ट्री' तो बना दिया, लेकिन विकास की परिभाषा केवल जीडीपी के आंकड़ों तक सीमित रह गई। एक विकसित राष्ट्र बनने के लिए सिर्फ गगनचुंबी इमारतें काफी नहीं होतीं; वहां की संस्थागत मजबूती, न्यायिक स्वतंत्रता और नागरिकों की क्रय शक्ति (Purchasing Power) मायने रखती है।
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने बुनियादी ढांचे पर खरबों डॉलर बहाए। सड़कें बनीं, पुल बने, लेकिन ग्रामीण इलाकों में बसने वाली 40 प्रतिशत आबादी आज भी उसी पुराने ढर्रे पर जी रही है। 'मिडल इनकम ट्रैप' (मध्यम आय का जाल) वह दलदल है जिसमें चीन इस वक्त बुरी तरह फंसा हुआ है। जब कोई देश तेजी से बढ़ता है लेकिन नवाचार और घरेलू खपत के मामले में पिछड़ जाता है, तो वह विकसित देशों की श्रेणी में प्रवेश करने से पहले ही थम जाता है। चीन के साथ बिल्कुल यही हो रहा है। बीजिंग की आक्रामक विदेश नीति और घरेलू सेंसरशिप ने उस बौद्धिक स्वतंत्रता को कुचल दिया है, जो एक विकसित समाज की पहली शर्त होती है।
गहन विश्लेषण: प्रति व्यक्ति आय और जनसांख्यिकीय संकट का गणित
चीन की सबसे बड़ी कमजोरी उसके आंकड़ों की विशालता में छिपी है। अगर हम $12,000$ से $13,000$ के आसपास की प्रति व्यक्ति जीडीपी को देखें, तो यह अमेरिका के $80,000$ के मुकाबले कहीं नहीं ठहरती। विकसित होने का मतलब है कि एक औसत नागरिक के पास उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सुरक्षा तक बिना किसी भेदभाव के पहुंच हो। चीन में 'हुकौ' (Hukou) प्रणाली जैसी पुरानी व्यवस्थाएं आज भी ग्रामीण प्रवासियों को शहरों में दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर रखती हैं।
इसके अलावा, चीन की आबादी अब उसकी ताकत नहीं, बल्कि सबसे बड़ी बाधा बन रही है। 'बूढ़ा होता चीन' (Aging China) एक ऐसी कड़वी हकीकत है जिसे शी जिनपिंग चाहकर भी नहीं बदल पा रहे। एक विकसित राष्ट्र बनने के लिए कार्यबल का युवा होना अनिवार्य है, लेकिन चीन में काम करने वाले लोगों की संख्या घट रही है और आश्रित बुजुर्गों की फौज बढ़ रही है। श्रम लागत बढ़ने से कंपनियां अब वियतनाम और भारत की ओर रुख कर रही हैं। उत्पादकता में इस गिरावट ने चीन के उस सपने पर पानी फेर दिया है जिसमें वह 2030 तक खुद को पूर्ण विकसित घोषित करने वाला था। भ्रष्टाचार और रियल एस्टेट सेक्टर में डूबे अरबों डॉलर के कर्ज ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है।
व्यावहारिक निहितार्थ: वैश्विक भू-राजनीति और 'विकासशील' होने का मुखौटा
दिलचस्प बात यह है कि चीन खुद भी कई बार विकसित होने के टैग से बचता नजर आता है। विश्व व्यापार संगठन (WTO) में 'विकासशील देश' का दर्जा चीन को कई रियायतें और सब्सिडी दिलाने में मदद करता है। यह बीजिंग की एक सोची-समझी कूटनीति है—दुनिया के सामने महाशक्ति बनना, लेकिन कागजों पर रियायतें बटोरने के लिए गरीब बने रहना। लेकिन यह दोहरा खेल अब खत्म हो रहा है। पश्चिम के देश अब चीन को रियायतें देने के मूड में नहीं हैं, जिससे उसके निर्यात आधारित मॉडल पर सीधा प्रहार हो रहा है।
व्यावहारिक धरातल पर देखें तो चीन का वित्तीय तंत्र अत्यंत अपारदर्शी है। जब तक किसी देश की मुद्रा, यानी युआन, पूरी तरह से परिवर्तनीय (Convertible) नहीं होती और वहां का शेयर बाजार पारदर्शी नहीं होता, उसे विकसित
चीन की विकास यात्रा की चुनौतियां और विशेषज्ञ सुझाव
चीन के "विकसित"
टिप्पणियाँ
अभी तक कोई टिप्पणी नहीं। सबसे पहले प्रतिक्रिया दें।