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जब भारतीय मध्यमवर्गीय परिवारों के ड्राइंग रूम की बात आती है, तो टीवी रिमोट किसी जादुई छड़ी से कम नहीं होता। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि वह कौन सा धारावाहिक है जिसने वक्त की धूल फांकते हुए सबसे अधिक एपिसोड्स का पहाड़ खड़ा कर दिया? इसका सीधा और सटीक जवाब है 'ये रिश्ता क्या कहलाता है'। हालांकि, अगर हम गैर-काल्पनिक यानी नॉन-फिक्शन श्रेणी को भी इसमें शामिल कर लें, तो 'कृषि दर्शन' जैसे दिग्गजों का कद हिमालय से भी ऊंचा नजर आता है।
टेलीविजन के बदलते प्रतिमान और लंबी कहानियों का सफर
भारतीय टीवी इंडस्ट्री का इतिहास किसी फिल्मी पटकथा से कम रोमांचक नहीं है। एक दौर था जब 'बुनियाद' और 'हम लोग' जैसे शो महज कुछ महीनों में अपनी बात कहकर विदा हो जाते थे। फिर आया नब्बे का दशक, जिसने टीवी को केवल मनोरंजन नहीं बल्कि एक दैनिक संस्कार बना दिया। एकता कपूर के 'के-सोप्स' ने 'डेली सोप' की परिभाषा ही बदल दी। सासों के ताने और बहुओं के त्याग ने टीआरपी के ऐसे शिखर छुए कि एपिसोड्स की गिनती सैंकड़ों से निकलकर हजारों में पहुंच गई। आज के दौर में एक शो का 500 एपिसोड पार करना बड़ी उपलब्धि है, लेकिन हमारे देश में कुछ ऐसे 'डायनासोर' शो भी हैं जो 4000 का आंकड़ा पार कर चुके हैं। यह महज एक संख्या नहीं है, बल्कि करोड़ों दर्शकों के साथ जुड़ा एक भावनात्मक अनुबंध है। इसमें कहानी का खिंचाव, पीढ़ियों का अंतराल (लीप) और किरदारों का मरकर वापस आना, सब कुछ इस मैराथन का हिस्सा है।
'ये रिश्ता क्या कहलाता है' और अन्य दिग्गजों का गहन विश्लेषण
अगर हम शुद्ध रूप से हिंदी फिक्शन यानी काल्पनिक कहानियों की बात करें, तो स्टार प्लस का शो 'ये रिश्ता क्या कहलाता है' फिलहाल निर्विवाद रूप से शीर्ष पर विराजमान है। साल 2009 में शुरू हुआ यह सफर अक्षरा और नैतिक की शादी से शुरू होकर आज उनकी चौथी पीढ़ी तक पहुंच चुका है। 4400 से अधिक एपिसोड्स के साथ यह शो भारतीय पॉप-कल्चर का एक अटूट हिस्सा बन गया है। लेकिन ठहरिए, क्या हम 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' को भूल सकते हैं? गोकुलधाम सोसाइटी की यह कॉमेडी पिछले 16 सालों से हर रात हमारे डिनर टेबल का हिस्सा बनी हुई है। करीब 4200 एपिसोड्स के साथ यह शो 'ये रिश्ता...' को कड़ी टक्कर दे रहा है। इन दोनों के बीच की होड़ दरअसल कंटेंट की नहीं, बल्कि दर्शकों की वफादारी की है। 'ये रिश्ता...' जहां जज्बात और पारिवारिक मूल्यों की बात करता है, वहीं 'तारक मेहता...' सामाजिक व्यंग्य और हास्य का सहारा लेकर इतनी लंबी पारी खेल रहा है।
इस निरंतरता के पीछे का विज्ञान और व्यावहारिक प्रभाव
इतने हजारों एपिसोड्स बनाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। इसके पीछे एक बेहद जटिल 'प्रोडक्शन इकोसिस्टम' काम करता है। लेखकों की एक फौज दिन-रात प्लॉट ट्विस्ट बुनती है ताकि दर्शक ऊब न जाएं। व्यावसायिक दृष्टिकोण से देखें तो इन लंबे शो का सबसे बड़ा फायदा 'एडवरटाइजिंग स्लॉट्स' की निरंतरता है। ब्रांड्स को पता है कि इन शोज की एक 'कन्फर्म्ड ऑडियंस' है जो कहीं नहीं जाने वाली। व्यावहारिक रूप से, ये शो रोजगार के भी बड़े स्रोत हैं। एक शो अगर दस साल चलता है, तो वह सैकड़ों टेक्नीशियनों और कलाकारों को एक स्थायी आजीविका प्रदान करता है। हालांकि, इसका एक नकारात्मक पक्ष 'क्रिएटिव फटीग' यानी रचनात्मक थकान भी है। अक्सर कहानी खींचने के चक्कर में तर्क और बुद्धि को ताक पर रख दिया जाता है, जिसे दर्शक सोशल मीडिया पर ट्रोल भी करते हैं। बावजूद इसके, इन शोज की रेटिंग यह साबित करती है कि भारतीय दर्शक अपने पसंदीदा किरदारों को हर हाल में देखना चाहते हैं, चाहे कहानी कितनी भी अजीबोगरीब मोड़ क्यों न ले ले।
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